आज बागवान काका आपके ले लेकर आए हैं एक पौराणिक कहानी सावित्री और सत्यवान की कथा। हो सकता है यह कहानी आपने अनेकों बार सुनी हो, लेकिन यहां लिखी कहानी आपके मन पर गहरी छाप छोड़ जाएगी। ऐसा हमारा विश्वास है।
ॐ जितेंद्र सिंह तोमर
सावित्री और सत्यवान की कथा सबसे पहले महाभारत के वनपर्व में मिलती है। जब युधिष्ठिर मार्कण्डेय ऋषि से पूछ्ते हैं कि क्या कभी कोई और स्त्री थी जिसने द्रौपदी जितना भक्ति प्रदर्शित की? तब ऋषि मार्कण्डेय युधिष्ठिर को सत्यवान और सावित्री की कथा इस प्रकार सुनाते हैं।
सावित्री ने मृत्यु का देवता यम को हराई।
सत्यवान सावित्री की कथा
Satyavan Savitri Story in Hindi

बहुत प्राचीन युग की बात है, भारत के दक्षिण कश्मीर में प्रसिद्ध तत्त्वज्ञानी राजर्षि अश्वपति नाम का राजा राज्य करता था। वह बहुत धर्मात्मा न्यायकारी और दयालु राजा था। उसके कोई संतान न थी ज्यों-ज्यों राजा की अवस्था बीत रही थी, उसे संतान होने से चिंता बढ़ रही थी। सावित्री प्रसिद्ध तत्त्वज्ञानी राजर्षि अश्वपति की एकमात्र कन्या थी।
ज्योतिषियों ने उसकी जन्म कुंडली देखकर बताया, "आपके ग्रह बता रहे हैं कि आपको संतान होगी। इसके लिए आप सावित्री देवी की पूजा कीजिए।"
राजा अश्वपति राज्य छोड़कर वन चले गए। अट्ठारह वर्ष तक उन्होंने तपस्या की। तब उन्हें मां सावित्री से वरदान मिला और उनके घर एक कन्या हुई। उसका नाम उन्होंने सावित्री रखा।
सावित्री अत्यंत सुंदर थी। उसकी सुंदरता और गुण की प्रशंसा दूर-दूर तक फैलने लगी। जैसे जैसे सावित्री बढ़ने लगी, वैसे वैसे उसका रूप निखरने लगा था। पिता को उसके विवाह की चिंता होने लगी। अश्वपति चाहते थे कि उसी के अनुरूप सावित्री को पति भी मिले किंतु कोई मिलता ना था।
सावित्री का मन बहलाने के लिए अश्वपति ने उसे तीर्थयात्रा के लिए भेज दिया, और उसे आज्ञा दी, "तुझे पति चुन लेने की पूर्ण स्वतंत्रता देता हूं"।
सावित्री तीर्थ यात्रा के लिए निकल पड़ी उसका रथ जा रहा था, कि उसे एक अद्भुत स्थान दिखाई दिया। उसमें एक अनुपम आकर्षण था। अनेक सुंदर वृक्ष के चारों ओर लहलहा रहे थे।
तभी सावित्री की निगाह छाल पहने हुए एक युवक पर पड़ी जो घोड़े के बच्चे के साथ खेल रहा था। उसके सिर पर जटा बनी थी। उसके मुख पर विचित्र सा तेज था।
तभी सावित्री की निगाह छाल पहने हुए एक युवक पर पड़ी जो घोड़े के बच्चे के साथ खेल रहा था। उसके सिर पर जटा बनी थी। उसके मुख पर विचित्र सा तेज था।
सावित्री ने देखा और मंत्री से कहा, "आज यही विश्राम करना चाहिए"।
रथ जब ठहरा तो वह युवक परिचय पाने के लिए उनके पास आया। उसे जब पता चला कि वह राजकुमारी है तो वह उन्हें बड़े सम्मान से अपने पिता के आश्रम में ले गया। उसने बताया कि वह वनवासी राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान् है। वह किसी समय सालवा देश के राजा हुआ करते थे। उसने यह भी बताया कि मेरे माता-पिता दृष्टिहीन है और वह इस समय यहां तपस्या कर रहे है। और हम अब घर चलाने व अग्निहोत्र के लिए लकड़ियां काटकर तथा फल फूल लाकर एक लकड़हारे की तरह जीवन बिता रहेे हैं। जब सत्यवान की पिता को पता लगा कि यह कि राजकुमारी आई हैं तो उन्होंने सत्यवान् को जितनी हो सके उनकी सेवा करने का आदेश दे दिया।
दूसरे दिन सावित्री घर लौट गई और बड़ी लज्जा तथा शालीनता से उसने सत्यवान से विवाह करने की अनुमति मांगी।
राजा अश्वपति बहुत प्रसन्न हुए कि सावित्री को उसके अनुरूप वर मिल गया है। अपने वर की खोज में जाते समय उसने निर्वासित और वनवासी राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान् को पतिरूप में स्वीकार कर लिया।
उसी समय वहां देव ऋषि नारद का आना हुआ वह एक बहुत बड़ी ज्योति शास्त्री भी हैं। जब देवर्षि नारद ने उनसे कहा कि सत्यवान् की आयु केवल एक वर्ष की ही शेष है। आज से ठीक एक वर्ष बाद सत्यवान की मृत्यु हो जाएगी।
तो भी सावित्री ने बडी दृढता के साथ कहा, "जो कुछ होना था सो तो हो चुका। भारतीय नारियां अपने जीवन में पति केवल एक ही बार चुनती हैं। जो मैंने चुन लिया है।"
माता-पिता ने भी सावित्री को बहुत समझाया, परन्तु सती अपने धर्म से नहीं डिगी।
सत्यवान एक साल से अधिक जीवित नहीं रहेगा। यह जानने के बाद सावित्री के पिता को बहुत दुख हुआ। उन्होंने सावित्री को सब प्रकार से समझाया, "बेटी ! ऐसा विवाह करना जन्म भर के लिए दुख मोल लेना है"।
सावित्री ने कहा-- "पिताजी! मुझे इस संबंध में आपसे कुछ कहते हुए संकोच तथा लज्जा का अनुभव हो रहा है। मैं विनम्रता के साथ आपसे निवेदन करती हूं कि आपने मुझे वर चुनने की स्वतंत्रता दी थी और मैंने सत्यवान को अपना वर चुन लिया। अब अपनी बात से हटना आपके आदर्श का अपमान होगा और युगों-युगों के लिए हमरे ऊपर कलंक लग जायेेेेगा। "
अश्वपति सावित्री की बात सुनकर निरुत्तर हो गए। उन्होंने विद्वानों को बुलाकर विचार विमर्श किया।
अंत में राजा अश्वपति ने सावित्री को तथा और लोगों के साथ लेकर सत्यवान के पिता के आश्रम में विवाह करने के लिए चले दिए। जब आश्रम निकट आया तब अश्वपति सब को छोड़कर आश्रम में गए और सत्यवान के पिता घुमंत्सेन से सावित्री का सत्यवान के साथ विवाह करने का विचार प्रकट किया। घुमंत्सेन ने पहले तो अस्वीकार कर दिया।
अंत में राजा अश्वपति ने सावित्री को तथा और लोगों के साथ लेकर सत्यवान के पिता के आश्रम में विवाह करने के लिए चले दिए। जब आश्रम निकट आया तब अश्वपति सब को छोड़कर आश्रम में गए और सत्यवान के पिता घुमंत्सेन से सावित्री का सत्यवान के साथ विवाह करने का विचार प्रकट किया। घुमंत्सेन ने पहले तो अस्वीकार कर दिया।
वह बोलेे, "महाराज मैं दरिद्र हूं। तपस्या कर रहा हूं, किसी समय में राजा हुआ करता था , किंतु अब तो कंगाल हूं। राजकुमारी को किस प्रकार अपनी यहां रखूंगा। राजन आप तो समझदार हैं उसे समझाएं और अपनेेेेेे साथ वापस ले जाएंं जाएं ।"
तब अश्वपति ने उन्हें सारी स्थिति बता दी और विवाह कर लेने के लिए आग्रह किया। अंत में सत्यवान के पिता मान गए और वहीं वन में दोनों का विवाह हो गया।
तब अश्वपति ने उन्हें सारी स्थिति बता दी और विवाह कर लेने के लिए आग्रह किया। अंत में सत्यवान के पिता मान गए और वहीं वन में दोनों का विवाह हो गया।
अश्वपति विवाह में बहुत साधन अलंकार आदि दे रहे थे। घुमत्सेन ने कुछ भी नहीं लिया। उन्होंने कहा, "मुझे इससे क्या काम? विवाह के पश्चात सावित्री यहीं आश्रम में रहना है। उसी से पूछ लो कि वह यह सब चाहती है या नहीं।"
सत्यवान् बडे धर्मात्मा, माता-पिता के भक्त एवं सुशील थे। सावित्री राजमहल छोडकर जंगल की कुटिया रहने लगी। उसने सारे वस्त्राभूषणों को त्याग दिए। वह सास-ससुर और पति जैसे वल्कल वस्त्र पहन लिये और अपना सारा समय अपने अन्धे सास-ससुर की सेवा में बिताने लगी।
उसने अपने सास-ससुर तथा पति सत्यवान की सेवा में अपना मन लगा दिया। सत्यवान और सावित्री सदा लोक-कल्याण तथा उपकार की बात करते थे।
सावित्री दिन भर घर का काम काज करती थी। जब कभी उसे अवकाश मिलता था तो वह भगवान से अपने पति की लंबी आयु की प्रार्थना करती थी। जैसे-जैसे समय निकट आता गया उनकी चिंता बढ़ती गई।
जब सत्यवान के जीवन के तीन दिन शेष रह गए तो सावित्री ने अपना भोजन भी त्याग दिया और दिन-रात प्रार्थना करने लगी। सभी उसे भोजन करने के लिए समझाते किंतु वह सबका अनुरोध टालती रही। तीसरे दिन जब सत्यवान जंगल में अग्निहोत्र और घर के लिए लकड़ी काटने जा रहे थे। आज सत्यवान् के महाप्रयाण का दिन है। सावित्री चिन्तित हो रही है। सत्यवान् कुल्हाडी उठाकर जंगल की तरफ लकडियाँ काटने चले। सावित्री ने भी साथ चलने के लिये अत्यन्त आग्रह किया।
सत्यवान ने समझाया, "तुमने तीन दिन से कुछ खाया नहीं है, तुम मेरे साथ मत आओ"। किंतुु, वह नहीं मानी और सत्यवान् की स्वीकृति पाकर और सास-ससुर से आज्ञा लेकर सावित्री भी पति के साथ वन में गयी। सत्यवान लकडियाँ काटने वृक्षपर चढे, परन्तु तुरंत ही उसे चक्कर आने लगा और वह कुल्हाडी फेंककर नीचे उतर आया। सावित्री समझ गई कि अनहोनी घटित होने वाली है। वह सत्यवान का सिर अपनी गोद में रखकर। अपने आंचल से हवा करने लगी। सत्यवान धीरे-धीरे बेहोश होने लगाा।
थोडी देर में ही उसने भैंसे पर चढे हुए, काले रंग के सुन्दर अंगोंवाले, हाथ में फाँसी जैसी डोरी लिये हुए, सूर्य के समान तेजवाले एक भयंकर देव-पुरुष को देखा। सावित्री ने देखा कि उसने सत्यवान् के शरीर से फाँसी की डोरी सहारे बँधे हुए अँगूठे के बराबर पुरुष को बलपूर्वक शरीर से बाहर खींच लिया। और इसी के साथ उसके प्राण पखेरू उड़ गए।
सावित्री ने अत्यन्त व्याकुल होकर आर्त स्वर में पूछा, "हे देव ! आप कौन हैं? और मेरे इन हृदयधन को कहाँ ले जा रहे हैं?"
उस छाया पुरुष ने उत्तर दिया, "हे तपस्विनी ! तुम पतिव्रता हो, अत: मैं तुम्हें बताता हूँ कि मैं यम हूँ और आज तुम्हारे पति सत्यवान् की आयु पूर्ण हो गयी है, अत: मैं उसे बाँधकर ले जा रहा हूँ। तुम्हारे सतीत्व के तेज के सामने मेरे दूत नहीं आ सके, इसलिये मुझे स्वयं आना पड़ा।" यह कहकर यमराज दक्षिण दिशा की तरफ चल पडे।
सत्यवान का शरीर धरती पर पड़ा रहा। सावित्री भी यमराज के पीछे पीछे चलने लगी। थोड़ी देर बाद यमराज ने मुड़ कर पीछे देखा तो सावित्री भी चली आ रही थी।
यमराज ने कहा-- "सावित्री! तुम कहां चली आ रही हो, तुम्हारी आयु बाकी है। तुम हमारे साथ नहीं आ सकती लौट जाओ। ऐसा कभी नहीं हुआ कोई जीवित शरीर मेरे साथ नहीं जा सकता। इसीलिए तुम लौट जाओ। "
इतना कहकर यमराज आगे बढ़े कुछ देर बाद यमराज ने फिर मुड़ कर देखा तो सावित्री चली आ रही थी। यमराज ने फिर कहा-- "तुम क्यों मेरे पीछे आ रही हो"।
सावित्री बोली-- "महाराज! मैं अपने पति को कैसे छोड़ सकती हूं"।
यमराज ने कहा-- "जो ईश्वर का नियम है, वह नहीं बदला जा सकता, ऐसा कभी नहीं हुआ कि कोई जीवित शरीर मेरे साथ गया हो। इसीलिए तुम लौट जाओ। तुम चाहो तो सत्यवान का जीवन छोड़कर जो मांगना है मांग लो और चली जाओ।"
यमराज ने कहा-- "जो ईश्वर का नियम है, वह नहीं बदला जा सकता, ऐसा कभी नहीं हुआ कि कोई जीवित शरीर मेरे साथ गया हो। इसीलिए तुम लौट जाओ। तुम चाहो तो सत्यवान का जीवन छोड़कर जो मांगना है मांग लो और चली जाओ।"
सावित्री ने बहुत सोच कर कहा-- "मेरे सास और ससुर देखने लगे और उनका राज्य वापस मिल जाए"
यमराज ने कहा, "ऐसा ही होगा"। और आगे बढ़ गए। थोड़ी देर बाद यमराज ने देखा कि सावित्री फिर पीछे-पीछे आ रही है।
यमराज ने सावित्री को बहुत समझाया लेकिन वह नहीं मानी तो यमराज ने एक बार फिर से कहा और कहा, "अच्छा एक वरदान और मांग लो। सावित्री ने कहा-- "मेरे पिता को सौ संतानों का सुख प्राप्त हो।" यमराज ने वरदान दे दिया और आगे बढ़ गए।
कुछ दूर जाने के बाद उन्होंने पीछे गर्दन घुमाकर देखा सावित्री चली आ रही है। उन्होंने कहा-- "सावित्री तुम क्यों चली आ रही हो"।
सावित्री ने कहा, "मुझे पति के बिना सुख, स्वर्ग और लक्ष्मी, किसी की भी कामना नहीं है। मैं अपने पति के साथ यहां आए थी और उसी के साथ वापस जाऊंगी वर्ना, अपने सास और ससुर को क्या जवाब दुंगी। मैं अपने पति को छोड़ कर नहीं जा सकती। मैं अपने शरीर का त्याग कर सकती हूूं। अपने पति का नहीं। आप मुझेे साथ लेे चलो।"।
यमराज चकराए कि यह कैसी स्त्री है। इतनी देर से कोई बात नहीं मान रही। पता नहीं क्या करना चाहती है।
उन्होंने कहा-- "बेटा तुम तो सभी शास्त्रों के ज्ञाता हो।, मेरी मजबूरी समझो। अच्छा! एक वरदान मुझसे और मांग लो। भगवान की इच्छा के विरुद्ध लड़ना बेकार है।
सावित्री ने कहा-- "महाराज! आप यदि वरदान ही देना चाहते हैं। तो यह वरदान दीजिए कि मुझे संतान प्राप्त हो जाए।"
सावित्री ने कहा-- "महाराज! आप यदि वरदान ही देना चाहते हैं। तो यह वरदान दीजिए कि मुझे संतान प्राप्त हो जाए।"
यमराज ने कहा ऐसा ही होगा और यमराज आगे बढ़े। किंतु कुछ ही दूरी पर उन्हें ऐसा लगा कि तीन तीन वरदान पाने के बाद भी वह लौटी नहीं। यमराज को क्रोध आ गया। यमराज ने कहा, "तुम मेरा कहना नहीं मानती हो। जाओ मैं तुम्हें साथ देता हूं।"
सावित्री ने कहा, "धर्मराज ! आप फिर से श्राप क्यों देते हैं ? आप पहले ही मुझे श्राप दे चुके हैं।"
"श्राप ! मैंने तो तुझे वरदान दिए हैं श्राप कैसे दिया?" यमराज ने गुस्से और आश्चर्य मिश्रित दृष्टि से सावित्री को देखा।
वह हाथ जोड़कर बोली, " महाराज ! आप मुझे संतान प्राप्ति का आशीर्वाद दे चुके हैं और मेरे पति को अपने साथ लिए जा रहे हैं । यह कैसे संभव हैै। बिना पति के संतान प्राप्ति नहीं तो और क्या है?"।
यमराज को अब तीसरे वचन का ध्यान आया। वचनबद्ध यमराज ने सत्यवान् के सूक्ष्म शरीर को पाशमुक्त करके सावित्री को लौटा दिया और और कहा, "सावित्री ! मैं तेरे तप और बलिदान से प्रसन्न होकर सत्यवान को चार सौ वर्ष की आयु प्रदान करता हूं। जाओ और सुख में जीवन व्यतीत करो।"
इस प्रकार उन्होंने सत्यवान के प्राण छोड़ दिए और सावित्री की दृढ़ता और धर्म की प्रशंसा करते हुए चले गए।
सावित्री ने अपनी धर्म तथा तपस्या के बल से असंभव को संभव बना दिया। तप और दृढ़ता में इतना बल होता है कि उसके आगे देवता भी झुक जाते है। इसी कारण सावित्री हमारे देश की नारियों में सर्वश्रेष्ठ हो गई और आज तक वह हमारे देश का आदर्श बनी हुई है।
सावित्री ने अपनी धर्म तथा तपस्या के बल से असंभव को संभव बना दिया। तप और दृढ़ता में इतना बल होता है कि उसके आगे देवता भी झुक जाते है। इसी कारण सावित्री हमारे देश की नारियों में सर्वश्रेष्ठ हो गई और आज तक वह हमारे देश का आदर्श बनी हुई है।