Sunday, November 2, 2025

कविताएं

1. काटे पेड़ चिनार के

काटे पेड़ चिनार के, ढाए सगरे ठाँव। 
क्या नाता उस गाँव से, जहाँ न ठंडी छाँव ।।

पीपल की छाया नहीं, पनघट भया उदास। 
क्या नाता उस गाँव से, जहाँ न बुझती प्यास ।।

चाचा की चौसर नहीं, भाई गए विदेश। 
क्या नाता उस गाँव से, बदले जिसके वेश।।

क्या नाता उस गाँव से, जहाँ न मन का मीत। 
प्रेम-सुबह आए नहीं, रात न पाए बीत।।

नदी ताल पर अब नहीं, भरते पानी लोग। 
कैसे देखे चाँद वो, जिसे प्रेम का रोग।

झूले सावन के गए, बरसे नहीं फुहार। 
उस पर घटता जा रहा, इश्क़ मुहब्बत प्यार।।

चाची ताई सब गईं, कहाँ रहोगे आप। 
क्या नाता उस गाँव से, जहाँ नहीं माँ-बाप ।।

खेत उगाए नफ़रतें, बाग़ उगाए ख़ार। 
क्या नाता उस गाँव से, जहाँ न पनपे प्यार।।

क्या नाता उस गाँव से, ये मत पूछो यार। 
जिसकी ठंडी छाँव में, था जीवन का सार।।
2. साँझ सुरमई हो गई

साँझ सुरमई जब हुई, आई पी की याद। 
जी लूँ उस पल ज़िंदगी, क्या पहले क्या बाद।।

चलो राधिका साथ में, लिए सुरमई साँझ । 
बाँसुरिया की ताल पे, हो जाए कुछ झाँझ ।।

साँझ सुरमई हो गई, पंछी भरें उड़ान। 
लगे खेत से लौटने, बैल मजूर किसान।।

रंग सुरमई साँझ के, लागें फाग समान। 
देख इन्हें हर्षे जिया, मुख आए मुस्कान।।

साँझ सुरमई हो गई, जब देखे घनश्याम। 
रंग अबीर गुलाल के, भए सखी नाकाम।।

रंग सुरमई साँझ के, भरे झील आगोश। 
कला ख़ुदा की देख के, उड़े सभी के होश।।

आग लगे दुख-दर्द को, ग़म हो जाएँ बाँझ। 
सागर में दिखती रहे, सदा सुरमई साँझ ।।

दिल की चिंता छोड़ के, कर ले अब कुछ काम। 
बैठ सुरमई साँझ में, मिले तुझे आराम ।।

देख सुरमई साँझ को, 'मीरा' भई उदास। 
कान्हा क्यों आए नहीं, बीत गया मधुमास ।।
3. चलो चलें ब्रज धाम

'मीरा' के कान्हा हुए, राधा के गोपाल। 
चलो चलें ब्रज धाम को, हम भी टेकें भाल।।

पीने प्याला प्रेम का, चलो चलें ब्रज धाम।
'मीरा' तेरे नाम की, बाट तकें घनश्याम ।।

मुरलीधर की क्या कहें, गोपी बनीं गुलाम । 
जब तक बजे न बाँसुरी, करें न कोई काम।।

प्रेम-सुधा में मस्त है, सगरा गोकुल ग्राम। 
बाँसुरिया की तान पर, चलो चलें ब्रज धाम।।

देखन रंग अबीर के, चलो चलें ब्रज धाम। 
आए होली खेलने, राधा के घनश्याम ।।

कुंज गली में आ गए, गिरिधर राधा साथ। 
होठों पर ले बाँसुरी, लिए हाथ में हाथ।।

'मीरा' ने गिरिधर चुने, राधा ने घनश्याम। 
हम कैसे पीछे रहें, चलो चलें ब्रज धाम।।

कोरे मन से भज मना, कभी राम का नाम। 
मन पर कब्जा काम का, कहाँ बिराजें राम।।

गिरिधर तेरे नाम की, महिमा अपरंपार । 
'मीरा' जब-जब है जपे, दिल को मिले करार।।
4. मानवता घायल हुई

मानवता घायल हुई, बिगड़ा सबका तौर। 
जाने अब कब आएगा, राम नाम का दौर।।

मानवता घायल हुई, रूठी हर मुस्कान। 
कल तक जो आबाद थे, आज हुए वीरान।।

मानवता घायल हुई, अरु मर्यादा तार। 
जाने किस का घर लुटा, जाने किसकी नार।।

मानवता घायल हुई, ख़तरे में था देश। 
लोग बाग घर छोड़ के, जाने लगे विदेश।।

जाने किस के धनुष से, निकले विष के तीर। 
मानवता घायल हुई, कौन बँधाए धीर ।।

मानवता घायल हुई, चली जंग में तोप। 
प्रेम-भाव ज़ख़्मी हुआ, यारी हुई अलोप।।

मानवता घायल हुई, राजनीति में यार। 
कीचड़ मला कुलीन पे, गुंडों का सत्कार।।

जंग करें जब देश दो, दिल करते यूँ चाक। 
मानवता नीची करें, रक्खें ऊँची नाक ।।

इश्क़ मुहब्बत प्यार तो, गए दौर की बात। 
मानवता की खो गई, जाने कहाँ सिरात ।।
5. मैं बालक नादान हूँ

मैं बालक नादान हूँ, माँ तू धर ले ध्यान। 
मुझको बस्ता चाहिए, और चाहिए ज्ञान।।

एक हाथ में केतली, दूजे में अख़बार । 
नाजुक सी इस उम्र में, कितना अत्याचार ।।

बचपन मत छीनो पिता, पढ़ने भेजो स्कूल। 
सूख न जाए आपकी, इस बगिया का फूल।।

टाई के सँग चाहिए, नेकर बूट जुराब। 
एक हाथ में हो क़लम, दूजे हाथ किताब ।।

यूँ तो कोई काम माँ, छोटा बड़ा न होत। 
पर पहले लूँ ज्ञान के, बीज खेत में जोत ।।

चाचा नेहरु का सदा, रहा यही अरमान । 
नौनिहाल इस देश के, बनें गुणों की खान।।

काग़ज़ क़लम दवात से, पाते बच्चे ज्ञान। 
पढ़-लिखकर हैं जज बनें, बनें नेक इंसान।।

बाल दिवस हर रोज़ हो, बच्चों की है चाह। 
इनको खूब घुमाइए, हर हफ़्ते हर माह ।।

बच्चे 'मीरा' देश के होते हैं अभिमान। 
इन्हें किताबें दीजिए, और दीजिए ज्ञान।।
6. बोई फसल किसान

बैल जोत कर खेत में, बोई फसल किसान। 
पर बारिश ने कर दिया, घर-भर का नुकसान।।

सुबह-सवेरे खेत में, करते काम किसान। 
ज्यों-ज्यों उगती पौध है, बढ़ती जाती शान।।

कच्चे घर हैं आपके, पर तन हैं मजबूत । 
लोग गाँव के यूँ लगें, जैसे कोई दूत।।

घर आए महमान की, सेवा करिए खूब। 
चाहे कोई गैर हो, चाहे हो महबूब ।।

सादा भोजन पेट में, मन में नेक विचार। 
यूँ ही लोग न गाँव के, पड़ें कभी बीमार ।।

चौपालों पर बैठ के, यूँ भी लेते काट हैं।
करते मन की बात। दुख से भारी रात।।

दिनभर सींचें खून से, अपने खेत किसान। 
तब जाकर उनके भरें, पेट और खलिहान ।।

पानी हैं गर राहतें, करना होगा कार। 
श्रम बिन मिलता है कहाँ, धन-दौलत घर-बार ।।

है किसान का शुक्रिया, देता हमें अनाज। 
भरना पेट अवाम का, सर्वोत्तम है काज।।
7. मिटा न मन का मैल

मिटा न मन का मैल गर, मत कर गंगा स्नान। 
पहले ख़ुद मन साफ़ कर, लेकर गीता ज्ञान।।

धरम-करम का क्या करें, मिटा न मन का मैल। 
जैसे पंडित नाम का, रहे बैल का बैल ।।

पत्थर में जब हरि बसें, पेड़ में क्यों न जान। 
काट रहे ख़ुद का गला, धन के लिए किसान।।

चाहे पढ़ ले पोथियाँ, पैसा कर ले दान। 
मिटा न मन का मैल जो, मिले नहीं भगवान।।

पावनता में निहित है, रिश्तों का संसार। 
मिटा न मन का मैल गर, हर रिश्ता बेकार ।।

बोई फसल गुलाब की, काटे हैं पर ख़ार। 
कमी कहां पर रह गई, किस विध करूं विचार ।।

कोठी गाड़ी के लिए, बेच रहे ईमान । 
गाड़ी महँगी आजकल, इज़्ज़त सस्ती जान।।

दुर्जन लाख नहा मगर, धुले न मन का मैल। 
जैसे अहम न त्यागती, कभी नार नख़रैल ।।

कर्म करो ऐसा सदा, जिसमें दिखे न दोष। 
वरना पाओगे नहीं, जीवन में संतोष ।।
8. मौसम है बरसात का

मौसम है बरसात का, भीगा मन का द्वार। 
मोर पपीहे आ गए, छाई देख बहार।।

जामुन आम अनार के, बौराए हैं पेड़। 
बेलें लिपटीं डाल से, करने छेड़मछेड़।।

मोर छमाछम नाचता, कोयल गाए गीत। 
सावन की बरसात में, जमकर भीगे मीत।।

बागों में झूले पड़े, सजी-धजीं सब नार। 
कजरी चढ़ी ज़बान पर, मन पर पी का प्यार।।

छाई सावन की घटा, उमड़-घुमड़ घन आय। 
बरस बरस कर मेघ ने, माटी दी महकाय।।

सावन रुत वैरन हुई, तन-मन दियो जलाय। 
आग लगी जो आब से, किस विधि कौन बुझाय।।

सावन सतरंगा हुआ, हरे हो गए पात। 
दिल के कितने रंग हैं, कौन बताए बात।।

नई-नवेली गा रहीं, कजरी-कमरी राग। 
पिया बिना बुझती नहीं, दिल में भड़की आग।।

'मीरा' चाहे प्रेम में, कर दो जान निसार। 
प्रेम न मिलता भीख में, यही प्रेम का सार।।
9. कौन हरे अब प्यास

मरुथल में पानी नहीं, कौन हरे अब प्यास। 
बादल भी बरसे नहीं, लोग तज रहे श्वास ।।

पानी बिना जहान की, चले न कोई नाव। 
आगे बढ़ने के लिए, आता काम बहाव ।।

एक बूंद पानी नहीं, कौन बुझाए प्यास। 
कंकड़ काम न आ सके, काग ने तजे श्वास ।।

जितने पत्थर डालिए, पानी गर्त समाय। 
घट भी सहरा सा हुआ, कागा प्राण गवाय।।

खेत सभी प्यासे हुए, रूठ गई बरसात। 
फसलें मुरझाने लगीं, कटे न ग़म की रात ।।

सागर से नदियाँ मिलीं, बुझी नहीं पर प्यास। 
खारे सागर से भला, कौन करे फिर आस।।

तट पर बैठी नार है, दूर नज़र दौड़ाय। 
नदी सूखती देख के, आँसू रही बहाय ।।

विरहन जलकर प्रेम में, बैठी टेक लगाय ।
दूर देस मनमीत है, कोई नहीं उपाय।।

एक तरफ़ सूखा पड़ा, एक तरफ़ है बाढ़। 
ऐसे जीवन में भला, कैसे रहता ठाढ़।।
10. मीरा पाती प्रेम की

'मीरा' पाती प्रेम की, लिखती सुबहो-शाम। 
लगन लगी वो कृष्ण से, भूली चारों धाम ।।

'मीरा' डूबी प्रेम में, सुध-बुध खोती जाय। 
लोग कहें दीवानगी, पर मन कृष्ण समाय।।

कान्हा तेरे नाम की, महिमा अपरंपार। 
'मीरा' विष को पी गई, समझ प्रेम की धार।।

'मीरा' मन की मानती, बेशक कितने धाम। 
दिया प्रेम का एक है, लाख ख़ुदा के नाम।

'मीरा' कहे समीर से, फैला प्रेम सुगंध। 
अमन-चैन कायम रहे, मिटे वैर दुर्गंध ।

'मीरा' मन में झांक ले, कितने उसके रूप। 
हाथ पकड़ उस गाथ का, जिस पर पड़ती धूप।

'मीरा' जोगन हो गई, भूली घर संसार। 
पहना चोला प्रेम का, छोड़ दिया श्रृंगार ।।

लौ लागी वो प्रेम की, भूलीं सगरे काम।
किया समर्पित कृष्ण को, 'मीरा' अपना नाम ।।

'मीरा' तूने प्रेम का, खूब किया गुणगान। 
अंत समय में पा लिया, कृष्ण हृदय में मान।।
11. वो क्या समझें वेदना

गुल सी जिनकी ज़िंदगी, महका घर-संसार। 
वो क्या समझें वेदना, चुभे न जिनको ख़ार।।

वो क्या समझें बेकली, वो क्या जानें पीर। 
जिनके हाथों की लिखी, ख़ुद उसने तक़दीर ।।

जिनको लागा ही नहीं, कभी प्रेम का रोग। 
वो क्या समझें बेकसी, क्या है मिलन वियोग।।

पैर बिवाइयाँ न फटीं, कभी न जोते खेत । 
वो क्या जानें दीनता, जिनके बड़े निकेत ।।

प्यार मिला, दौलत मिली, मिला जिन्हें घर-द्वार। 
वो क्या समझें बेबसी, ईश्वर जिनका यार।।

'मीरा' घर संसार में, रिश्ते भए हज़ार। 
वक़्त मुसीबत का पड़े, रुकें नहीं तब द्वार।।

काँटा चुभा न पाँव में, मन में उठा न दर्द। 
वो क्या जानें ज़िंदगी, है कितनी बेदर्द।।

दर्द पराया देख के, रोएँ जिनके नैन। 
या हैं सच्चे आदमी, या फिर मोतबरैन ।।

'मीरा' अपने हाथ से, लिख ऐसी तक़दीर। 
कोई कह पाए नहीं, ये क्या जाने पीर।।
12. चट मँगनी पट ब्याह

माँ करवा मत दीजिओ, चट मँगनी पट ब्याह । 
मुझको लेनी है अभी, उनके दिल की थाह।।

चट मँगनी पट ब्याह ने, छीने सब अरमान। 
सोचा था इस प्रेम का, लेंगे हम संज्ञान।।

सनम तुम्हारे प्यार में, कौन भरे अब आह। 
यही सोचकर कर रहे, चट मँगनी पट ब्याह ।।

समय बड़ा बलवान है, कब कर दे सब स्वाह। 
काल नहीं सो आज कर, चट मँगनी पट ब्याह ।।

मिले नहीं जिस नार से, हुई उसी से प्रीत। 
चट मँगनी पट ब्याह की, बड़ी अनोखी रीत।।

चट मँगनी पट ब्याह से, लड़की हुई अधीर। 
दोष न वर में हो कहीं, पाँव पड़े जंजीर ।।

चट मँगनी पट ब्याह से, लड़का करे मलाल। 
जाने कैसी हो वधू मन में उठे सवाल ।।

लड़का राँझे सा नहीं, और न लड़की हीर। 
चट मँगनी पट ब्याह से, फूट गई तक़दीर ।।

चट मँगनी पट ब्याह के, 'मीरा' लाभ हज़ार। 
मौका मिले न गैर को, भरमाने को नार।।

13. राह नहीं आसान

लोग कहेंगे प्यार की, राह नहीं आसान। 
पर तुम धीरज धारना, खोना मत ईमान ।।

मुमकिन कर दिखला दिया, जो भी बैठे ठान। 
कौन कहे है इश्क़ की, राह नहीं आसान।।

हमने दिल को हार कर, जीत लिए मैदान। 
दुनिया कहती रह गई, राह नहीं आसान।।

जंगल सी है ज़िंदगी, राह नहीं आसान। 
जिसने पा लीं मंज़िलें, वो ही चतुर सुजान ।।

कभी कहो मत प्रेम की, राह नहीं आसान। 
ये है नेमत ईश की, हो इसका सम्मान।।

छोड़ो कहना प्रेम की, राह नहीं आसान। 
चलो कभी इस राह पे, करो कभी उत्थान ।।

राह न देखी प्रेम की, कहते पर आसान। 
बिना पढ़े ही वेद को, बन बैठे विद्वान ।।

जलो प्रेम की आग में, कुंदन कर लो जान। 
कहने दो जो कह रहे, राह नहीं आसान।।

कहें मुझे जो प्रेम की, राह नहीं आसान। 
वही कहेंगे जीत पे, पंडित और महान।।

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