Thursday, December 8, 2022

विधा :#_गजल

🌷विषय : – गजल    
🌷विधा : – गजल🌷

सादर नमन, वंदन, अभिनंदन। 

अरबी भाषा के गजल शब्द का अर्थ है औरतों से या औरतों के बारे में बातें करना।

फ़ारसी से उर्दू में आने पर भी ग़ज़ल का शिल्पगत रूप ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया गया लेकिन कथ्य भारतीय हो गया। लेकिन उत्तर भारत की आम अवधारणा के विपरीत हिन्दोस्तानी ग़ज़लों का जन्म बहमनी सल्तनत के समय दक्कन में हुआ जहाँ गीतों से प्रभावित ग़ज़लें लिखी गयीं। भाषा का नाम रेख़्ता (गिरा-पड़ा) पड़ा।

ग़ज़लों का आरंभ अरबी साहित्य की काव्य विधा के रूप में हुआ। अरबी भाषा में कही गयी ग़ज़लें वास्तव में नाम के ही अनुरूप थी अर्थात उसमें औरतों से बातें या उसके बारे में बातें होती थी।

विधान : शेर बेशक कम कहें लेकिन जानदार कहें। जो इसके जानकार हैं वे तो सब समझते ही हैं जो नवांकुर हैं उनके लिए कुछ आवश्यक बातें मार्गदर्शन हेतु प्रस्तुत कर रहे हैं- 

👉1. मात्रा ज्ञानः 
 लघु : –> जिस अक्षर पर कोई मात्रा न हो अथवा छोटी मात्रा हो अथवा अनुस्वार(ँ) हो उसकी मात्रा लघु 1 गिनी जाती है। 

दीर्घ : –> जिस अक्षर पर बड़ी मात्रा हो अथवा अनुस्वार (ं) लगा हो अथवा तुरन्त बाद आधा अक्षर हो तो उन सबकी मात्रा दीर्घ 2 गिनी जाती है।

शून्य : –> यदि दीर्घ मात्रा के बाद आधा अक्षर हो तो आधा अक्षर की मात्रा नहीं गिनी जाती किन्तु कभी कभी आधा अक्षर के पूर्व का अक्षर अगर दो मात्रा वाला पहले ही है तो फिर आधा अक्षर की भी एक मात्रा अलग से गिनते हैं, जैसे-रास्ता 212 वास्ता 212 उच्चारण के अनुसार। 

अपवाद स्वरूप कुछ शब्दों जैसे इन्हें, उन्हें, तुम्हारा आदि में आधा अक्षर की मात्रा नहीं गिनी जाती। यदि पहला अक्षर आधा हो तो उसकी मात्रा नहीं गिनी जाती।

👉2. रुक्न (अरकान): 
इसे गण, टुकड़ा या खण्ड कहते हैं जिसमें लघु (1) दीर्घ (2) मात्राओं का एक क्रम होता है , जैसे 1222, 2122 आदि। कई रुक्न के मेल से मिसरा/शेर/गज़ल बनती है। इन्हीं से बहर का निर्माण होता है। मुख्यतः अरकान कुल आठ (८) हैं।

👉3. बहरः 
रुक्न/अरकान /मात्राओं के एक निश्चित क्रम को बहर कहते हैं।

👉4. काफ़ियाः 
काफिया के शब्द सचल होते हैं। अर्थात बदलते रहते हैं। हर शब्द में कुछ अक्षर अचल और पहला अक्षर स्वर अचल  होता है। दोनों को मिलाकर काफिया बनता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि क़ाफिया अचल है किन्तु काफिया के शब्द सचल।

👉5.रदीफः 
क़ाफ़िया के बाद आने वाले अक्षर, शब्द या वाक्य को रदीफ़ कहा जाता है। यह मतले के शेर के दोनो मिसरों में और बाकी के शेर के सानी मिसरे में काफिया के साथ जुड़ा रहता है। यह अचल और अपरिवर्तित होता है। इसमें बदलाव नहीं होता।यह एक अक्षर का भी हो सकता है और एक वाक्य का भी। किन्तु छोटा रदीफ़ अच्छा माना जाता है। शेर से रदीफ़ को निकाल देने पर यदि शेर अर्थहीन हो जाए तो रदीफ़ अच्छा माना जाता है।

👉6. मतला :
पहला शेर मतला होता है जिसके दोनों शेर में काफिया व रदीफ़ होते हैं।

👉7. मकता :
अंतिम शेर मकता कहलाता है, जिसमें गजलकार का नाम भी जुड़ा होता है। 

👉8. शेरों की संख्या : 
शेरों की संख्या विषम रखें तो बेहतर है। एक गजल में कम से कम 5 शेर होने चाहिए।

ग़ज़ल के प्रकार

तुकांतता के आधार पर ग़ज़लें दो प्रकार की होती हैं-

  • मुअद्दस ग़जलें- जिन ग़ज़ल के अश'आरों में रदीफ़ और काफ़िया दोनों का ध्यान रखा जाता है।
  • मुकफ़्फ़ा ग़ज़लें- जिन ग़ज़ल के अश'आरों में केवल काफ़िया का ध्यान रखा जाता है।

भाव के आधार पर भी गज़लें दो प्रकार की होती हैं-

  • मुसल्सल गज़लें- जिनमें शेर का भावार्थ एक दूसरे से आद्यंत जुड़ा रहता है।
  • ग़ैर मुसल्सल गज़लें- जिनमें हरेक शेर का भाव स्वतंत्र होता है।


          ग़ज़ल लिखना बेहद आसान है दोस्तो... आप प्रदत्त मिसरे /बहर को मन की सरगम पर गुनगुनाइये। जितनी बार गुनगुनायेंगे उतनी आसानी से आपके मन के पटल पर शेर आते जायेंगे। आप हैरान होंगे कि इसी बह्र के ढेर सारे शेर आपकी जुबान पर आने लगें हैं। बस उन्हें लिखते जाईयेगा, बन गई ग़ज़ल। है न आसान... तो आईये आज हम एक ऐसी ग़ज़ल कहें जो हमारे ख़यालात को बयां करे। हो सकता है ये ग़ज़ल आपको बुलंदी व अलग पहचान दिला दे। और आप दुनिया के मशहूर शायरों में शुमार होने लगे। हमें आपकी बेशकीमती ग़ज़ल का इंतजार रहेगा... और हां ग़ज़ल ही कहें😀😀
 
#अपनी_एक_गजल_इसी_बह्र_रदीफ़_व_काफिया_पर_अपनी_ही_आवाज_में #आप_सभी_के_समक्ष_प्रस्तुत_है

#मिसरा: #गजल_हमारी_बनी_मुहब्बत_उसी_की_खुशबू_महक_रही_है
#बहर_12122_12122_12122_12122
#काफिया: #अक
#रदीफ: #रही_है
#तर्ज : #तुम्हारी_नजरों_में_हमने_देखा_अजब_सी_चाहत_झलक_रही_है

गजल  हमारी  बनी  मुहब्बत, उसी  की खुशबू महक रही है।
दिवाना  मैं  हूँ  गजल  दिवानी, दिवाने दिल में चहक रही है।।

मिली हैं खुशियाँ हमें गजल से, हमारे दिल ने ये राज खोला,
हमारी धड़कन में सज सँवर के, गजल हमारी धड़क रही है।

कशिश गजल की हमारे दिल में, बहार महफिल सजा गई तो,
वहीं  से  चलके  सुरों  में ढलके, गजल दिवानी बहक रही है।।

चली  हृदय से लहर लहरकर, सुरों की सरगम हमारे लब पर,
लबों  से  निकली  सुरीली  धारा, गजल सुरीली खनक रही है।

ये  कृष्णप्रेमी  बना  है  शायर, उसी  गजल  के दिवानेपन से,
उसी  गजल  की चमक तो देखो, लबों पे कैसे झलक रही है।।

         तो आइए आप सभी अपनी अप्रतिम रचनाएं अपने अनुसार लिए गए बह्र, रदीफ़ व काफिया पर इसी विषय प्रवर्तन के कमेंट बॉक्स में ही #का प्रयोग करते हुए प्रेषित करें🙏🌹🙏🌹🙏🌹

                           #स्वरचित

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-माँ श्री राधारानी के पावन श्रीचरणों की पावन 'रज'
              "कृष्णप्रेमी" गोपालपुरिया प्रमोद पाण्डेय
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