Tuesday, April 9, 2024

अनोखी कहानियां | 03 | "भोला भगत"

.              अनोखी कहानियां | 03 | "भोला भगत"

         एक गाँव के बाहर छोटा सा शिव मन्दिर था, जिसमें एक वृद्ध पुजारी रहते थे। एक दिन एक गरीब माँ अपने नन्हे से बालक को मन्दिर के द्वार पर छोड़कर चली गई। बहुत खोजने पर भी पुजारीजी को बालक के परिवार का कुछ भी पता न चला।
         जब गाँव का भी कोई व्यक्ति उस बालक का लालन-पालन करने को तैयार न हुआ तो पुजारीजी ने भगवान् शिव की इच्छा समझकर उसे अपने पास रख लिया और उसका नाम भोला रख दिया।
         गाँव के श्रद्धालु भक्तों से जो कुछ प्राप्त होता, उसी से भगवान् शिव का, पुजारीजी का और बालक भोला का किसी तरह गुजारा चलता। यदि किसी दिन कम भी पड़ता तो पुजारीजी बालक और भगवान् को भोग लगाकर स्वयं गंगाजल पीकर रह जाते।
         धीरे-धीरे भोला बड़ा होने लगा और अब वह पुजारीजी के कामों में हाथ बँटाने लगा। वृद्ध पुजारीजी के थके-हारे हाथों को कुछ आराम मिलने लगा, इसलिए उन्होंने भोला को मन्दिर की सफाई, भगवान् शिव की पूजा, उनको भोग लगाने और उनकी आरती करने की विधि अच्छी प्रकार समझा दी। अब वे स्वयं भगवान् शिव के नाम जप और संकीर्तन में समय व्यतीत करने लगे। 
         एक दिन भगवान् शिव के मंगलकारी नाम शिव, शिव, शिव, शिव का जप करते हुए ही उनके प्राण छूट गए। अब बालक भोला का इस संसार में भगवान् शिव के सिवा और कोई सहारा न रहा। उसने पुजारीजी की ये तीन बातें कभी नहीं भूलीं...
01. भगवान् भोलेनाथ शिव शंकर को ताजी-गर्म रसोई का ही भोग लगाना।
02. भगवान् को भोग लगाए बिना स्वयं कुछ भी नहीं खाना।
03. भगवान् शिव पर विश्वास रख कर कभी भी किसी भी वस्तु का संग्रह न करना, बासी भोजन का भी नहीं।
         यदि कोई भक्त पहले से बना भोजन या मिठाई मन्दिर में दे जाता, तो बालक भोला उसे गरीबों में बाँट देता। वह ताजी रसोई बनाकर ही भगवान् को भोग लगता, उसके बाद ही स्वयं प्रसाद ग्रहण करता और यदि बचता तो उसे बाँट देता। यदि रसोई बनाने को सामग्री न होती, तो भोलेबाबा और भोला भगत दोनों गंगाजल पीकर ही रह जाते।
         एक बार बरसात का मौसम आया और तीन-चार दिन तक मूसलाधार वर्षा होने से मन्दिर में एक भी भक्त नहीं झाँका। भोला अपने भोलेबाबा को गंगाजल का ही भोग लगाता और उसे ही पीकर रह जाता। भोले बाबा बालक की भक्ति और सहनशक्ति की परीक्षा लेते रहे। 
         किन्तु आखिर में अपने भक्त बालक को भूख से तड़पते देख उनसे रहा न गया। वे सेठ के नौकर का रूप धरकर, हाथ में भोजन सामग्री की पोटली लेकर वर्षा में भीगते हुए मन्दिर के द्वार पर जा पहुँचे। उन्होंने आवाज लगाकर भोला को बुलाया और उसके हाथ में पोटली देते हुए बोले, "सेठजी ने यह सीधा (कच्चा राशन) भेजा है। इससे रसोई बनाओ, भोग लगाओ और स्वयं भी प्रसाद पाओ। मैं कल फिर आऊँगा।"
         भोला भगत ने आशीर्वाद देकर उसे विदा किया और सूखी-गीली लकड़ियों के धुएँ में गर्म रसोई बनाकर भोलेबाबा को भोग लगाया। पूरे बरसात के मौसम में भोलेबाबा नौकर के वेष में भोला भगत को सीधा देने आते रहे और स्वयं भी गर्मागर्म रसोई का भोग पाते रहे।
         एक दिन भोला भगत ने सोचा कि सेठजी को सीधा भेजते हुए चार महीने हो चले हैं, किन्तु वे स्वयं कभी मन्दिर में भोले बाबा का प्रसाद ग्रहण करने नहीं आए।
         अगले दिन जब भोले बाबा नौकर के वेष में सीधे की पोटली देने आए तो भोला भगत उनसे बोला, "भाई ! तुम्हारे इतने धर्मात्मा सेठजी कभी स्वयं मन्दिर में प्रसाद लेने नहीं आए। इस कारण मेरा हृदय अत्यंत दुःखी हो रहा है। अपने सेठजी से कहना कि कल वे भी मन्दिर में प्रसाद ग्रहण करने अवश्य पधारें।" 
         भक्त की बात सुनकर नौकर बने भोलेबाबा चौंककर घबरा उठे और बोले, "पुजारीजी ! "सेठजी मेरे द्वारा आपको सीधा भेजते हैं, आप इससे भगवान् को भी भोग लगा लेते हैं और स्वयं भी प्रसाद पाते हैं। फिर सेठजी को बीच में बुलाने की क्या जरुरत है ? जैसा चल रहा है, वैसे ही चलने दीजिए न।"
         भोला बोला, "ऐसे कैसे चलने दूँ ? आपके धर्मात्मा सेठजी इतने दिनों से सीधा भेज रहे हैं, क्या मैं उन्हें भगवान् का प्रसाद देने का अपना कर्तव्य भी पूरा न करूँ ? मैं किसी का उधार खाने वाला नहीं हूँ। अपने सेठजी से कह देना कि यदि कल भोले बाबा का प्रसाद ग्रहण करने न पधारे, तो मैं उनका सीधा लेना बन्द कर दूँगा।"
         नौकर बने भोलेबाबा तो अपने भोले भगत की अकड़ देखकर काँप उठे और यह सोचकर मन ही मन हँसे कि वाह ! आज तो लेने वाला ही देने वाले पर धौंस दिखा रहा है। लेकिन सरल हृदय भक्त के मनोभाव पर रीझकर वे बोले, "ठीक है पुजारीजी ! कल सेठजी मन्दिर में प्रसाद ग्रहण करने जरूर पधारेंगे।"
         दूसरे दिन बड़े सबेरे ही भोलेबाबा नौकर के वेष में दूध और बहुत सारी भोजन सामग्री लेकर मन्दिर पहुँच गए।
         भोला चौंकते हुए बोला, "भाई ! आज इतना सारा सीधा किसलिए ले आए ?"
         नौकर बने भोलेबाबा बोले, "पुजारीजी ! भूल गए क्या ? आज आपने सेठजी को प्रसाद के लिए बुलाया है। इसलिए आप छककर रसोई बनाइए और भोलेबाबा को भोग लगाइए। हाँ ! यह तो बता दीजिए कि सेठजी किस समय पधारें ?"
         भोला ने प्रसन्न होकर उन्हें सेठजी के आने का समय बता दिया। और भोलाभक्त की इच्छा पूर्ण करने के लिए भोलेबाबा कैलाश पर सेठ का रूप धारण करने लगे। 
         इधर अपने स्वामी को एक प्यारे भक्त के यहाँ जीमने जाने का समाचार सुनकर ममतामयी अन्नपूर्णा माँ पार्वती भी भला कैसे पीछे रहतीं ? वे भी पति की आज्ञा लेकर सेठानी का रूप धारण करने में जुट गईं।
         भोलेबाबा ने अपने गले से मुंडों की माला उतार दी, शरीर पर लगी भस्म, कमर पर पहना हुआ बाघांबर और बाँहों और कानों में पहने साँपों के हार भी उतारकर रख दिए।
         उन्होंने एक मखमल का सुन्दर कुर्ता धारण कर लिया। अपनी जटाएँ सीधी कर गंगा और चंद्रमा को उसमें छिपा लिया और ऊपर से एक सुन्दर रंग-बिरंगी पगड़ी पहन ली। सदैव नंगे पैर विचरण करने वाले शिवजी ने आज अपने पैरों में रेशमी जूतियाँ धारण कर लीं। हाथ का त्रिशूल और डमरू भोलेबाबा ने नन्दी के हाथ में थमा दिया और अपने हाथ में एक सुन्दर छड़ी लेकर पार्वतीजी के तैयार होने की प्रतीक्षा करते हुए कैलाश पर चहलकदमी करने लगे।
         पार्वतीजी घंटों से मेकअप करने में जुटी हुईं थीं। उन्होंने आज अपने पतिदेव के नगर में बनी सुन्दर बनारसी साड़ी निकालकर पहनी, जिसका रंग सेठ बने शिवजी के कुर्ते से मैच कर रहा था। उन्होंने सोने-चाँदी-हीरे के जगमगाते हुए आभूषण धारण कर लिए, पैरों में सुन्दर सैंण्डल पहन लीं, बगल में सुन्दर-सा पर्स दबा लिया और भोले बाबा के बार-बार आवाज लगाने के बाद श्रृंगार कक्ष से बाहर निकलकर आईं।
         जब पार्वतीजी और शिवजी ने एक-दूसरे को सेठ-सेठानी के वेष में देखा, तो वे चकित होकर एक-दूसरे को निहारते ही रह गए। दोनों एक-दूसरे को देख-देखकर निहाल हुए जा रहे थे। इससे पहले उन्होंने कभी एक-दूसरे का ऐसा सुन्दर रूप देखा ही नहीं था।
         जब भगवान् गौरीशंकर सेठानी-सेठ का रूप धरकर कैलाश से अपने भक्त के यहाँ दावत उड़ाने चले, तो गणेश, कार्तिकेय, नंदी, ऋषि-मुनि, देवता, देवाङ्गनाएँ भी उन्हें देखकर ठगे से रह गए। 
             सेठ बने शिवजी अपने हाथ में ली हुई छड़ी को अदा से घुमाते हुए पृथ्वी पर टेकते हुए चल रहे थे, और उनके पीछे-पीछे बगल में पर्स दबाए, अपनी सैंण्डल से टक-टक और पायलों से छन-छन की मधुर ध्वनि करती हुई माँ पार्वती सेठानी बनी हुई चल रही थीं। 
         भोला भगत आज सुबह से ही सेठजी के स्वागत में भाँति-भाँति के पकवान बनाने में जुटा हुआ था। अपने भोलेबाबा का भोग तो वह चलते-फिरते बना लेता था, किन्तु आज उसे कई महीने से भगवान् को भोग लगाने के लिए सीधा भेजने वाले सेठजी को भगवत्प्रसाद देना था, अतः आज उसने अपनी सारी पाककला झोंक डाली थी।
         उसने सेठजी द्वारा भेजे हुए चावल धोकर खीर बनाई, उसे धीमी आँच पर पकाकर गाढ़ा किया और उसमें सेठजी के द्वारा भेजे हुए पिस्ते, बादाम, केसर, चिलगोजे, किशमिश डाले। मिर्च और अदरख को कूटकर, उसे बाजरा, बेसन और गेहूँ के आटे में भर-भरकर मोटे-मोटे मिस्से टिक्कड़ बनाए।
         रसोई बनाकर भोला भगत पुनः स्नान करने चला गया ताकि स्वच्छ वस्त्र पहनकर भोले बाबा को भोग लगा सके और सेठजी को उनका प्रसाद पवा सके।
         जब भोला भगत स्नान करके लौटा तो देखा सेठजी प्रसाद ग्रहण करने के लिए स्वयं तो आए ही हैं, संग में अपनी सेठानीजी को भी ले आए हैं। 
         भोला ने झट दोनों से राम-राम की, उन्हें आसन देकर बैठाया और बोला, "मैं अभी भगवान् को भोग लगाकर आता हूँ, फिर आपको प्रसाद परोसूँगा।"
         भावना के भूखे भोलेबाबा से भूख सहन नहीं हो पा रही थी। इसलिए वे बोले, "पुजारीजी ! भगवान् को जल्दी से भोग लगाइए, मुझसे भूख सहन नहीं होती।"
         भोला भगत बोला, "सेठजी ! भूख तो मुझे भी बड़े जोर से लग रही है, किन्तु मैं अपनी भूख के कारण भगवान् को भोग लगाना नहीं भूलता। यदि दुनिया के सारे लोग इसी तरह अपनी भूख के लिए भगवान् को भोग लगाना भूल जाएँ तो भगवान् तो भूखों मर जाएँगे।" 
         सेठजी बने भोलेबाबा एक पत्तल उठाते हुए बोले, "पुजारीजी ! आप भोग लगाइए। इधर मैं पत्तल परोस लेता हूँ। मुझसे भूख सहन नहीं हो पा रही है।"
         भोला भगत सेठजी बने भोलेबाबा को डाँटते हुए बोला, "सेठजी ! भगवान् के काम में न तो जल्दीबाजी चलती है और न कंजूसी। मैं जब तक भगवान् को भोग नहीं लगा लेता, आप रसोई के पास भी नहीं फटक सकते। चुपचाप इधर बैठ जाइए और 'ॐ नमः शिवाय्।' जपते रहिए। मैं अभी आता हूँ और आपको पेट भर भोजन कराता हूँ।"
         सेठ बने शिवजी डाँट खाकर चुपचाप अपने आसन पर जा बैठे। सेठानी बनी पार्वती उनकी यह दशा देख बड़ी मुश्किल से अपनी हँसी रोक पाईं।
         लेकिन जैसे ही भोला भगत पत्तल में सामग्री लेकर भगवान् को भोग लगाने मन्दिर में गया, शिवजी पार्वतीजी को मौन रहने का संकेत करते हुए चुपके-चुपके पैर रखते हुए रसोई में पहुँच गए और उन्होंने एक-एक व्यंजन उठाकर चखना शुरू कर दिया। भोलेबाबा तो प्रसाद को चखते ही भौंचक्के रह गए ! खीर में चीनी की जगह नमक भरा हुआ था और सब्जियों में चीनी भरी हुई थी।
         जैसे ही भोले बाबा ने रोटी का एक ग्रास तोड़कर मुँह में दिया, वे सी-सी करने लगे, क्योंकि रोटी में मिर्च ही मिर्च भरी थी। वे सी-सी करते हुए उल्टे पैर भाग आए और अपने आसन पर जा बैठे। 
         माँ पार्वती अपने स्वामी की यह हालत देखकर खिलखिलाकर हँस पड़ीं। इससे पहले कि भोलेबाबा पार्वती जी के सामने कुछ सफाई दे पाते, भोला भगत 'ॐ नमः शिवाय्।' मंत्र का जप करते हुए आ पहुँचा। उसने भोग को रसोई में मिलाकर उसे पवित्र बना डाला और फिर सेठजी के सामने पत्तल परोसकर हाथ जोड़कर बोला, "सेठजी ! अब आप जी भरकर प्रसाद पाइए।"
         भोलेबाबा तो अभी-अभी भक्त की भक्ति से भी जोरदार उसके हाथ की बनी हुई रसोई चख चुके थे, अतः उसे जीमने की बात सुनकर उनके पसीने छूटने लगे। कभी वे भोला का तो कभी पार्वती का मुख देखने लगते। भोला को सेठजी की ढ़ील बर्दाश्त नहीं हुई और बोला, "सेठजी ! अब क्या हो गया आपको ? अभी-अभी तो इतनी उतावली मचा रहे थे ? अब क्यों नहीं जीमते ? आप जीमोगे, तभी तो माताजी भी प्रसाद ग्रहण करेंगी और फिर मैं भी प्रसाद पाऊँगा।"
         भोला की ललकार सुनकर भोलेबाबा ने चुपचाप खीर का कुल्हड़ उठाया और सारी नमकीन खीर गटागट पी गए। कुल्हड़ खाली होने की देर थी कि भोला ने उसे झट से भर दिया। अपने प्रिय भक्त के हाथों परोसे हुए भोग में भगवान् को आज दुगना स्वाद आने लगा। भोला परोसता गया और भोलेबाबा पीते गए।
         जगन्माता पार्वती भक्त और भगवान् दोनों के प्रेम को देख-देखकर मंत्रमुग्ध होती रहीं। जब सारी रसोई समाप्त हो गई तो भगवान् ने एक जोर की डकार ली। भोला को होश आया और बोला, "वाह सेठजी वाह ! मैं ही बावला था, जो इतनी थोड़ी-सी रसोई बनाई। मुझे पता होता कि आपको प्रसाद ग्रहण करने का इतना शौक है, तो और भी ज्यादा रसोई बनाता।"
         भोलेबाबा अपने पेट पर हाथ फेरते हुए सेठानी बनी पार्वतीजी की ओर मुस्कराकर देखते हुए बोले, "पुजारीजी ! मैं इतना रोज कहाँ खाता हूँ ? किन्तु आज प्रसाद इतना स्वादिष्ट बना था कि अपने पर वश ही नहीं रहा और खाता ही चला गया।" 
         किन्तु तभी भोला भक्त रुआँसा होकर बोला, "सेठजी ! वह तो आपने ठीक किया। लेकिन माताजी तो भूखी ही रह गईं।" ममतामयी पार्वती माँ से भोला का रुआँसा मुख देखा नहीं गया। उन्होंने बची हुई खीर की चार बूँदें अपने कंठ में टपका लीं।
         भोलेबाबा द्वारा भोग लगाने से प्रसाद में अद्भुत अलौकिक स्वाद भर गया था। ऐसी सुगंधित और मीठी खीर चखकर जगज्जननी आकण्ठ तृप्त हो गईं और उनके तृप्त होते ही सृष्टि का प्रत्येक प्राणी तृप्त हो गया।
         भोला भगत बोला, "सेठजी ! आपने और माताजी ने प्रसाद ग्रहण कर लिया, इससे मुझे अत्यंत संतोष हुआ है। समझ लीजिए कि आप दोनों द्वारा प्रसाद ग्रहण करने से मेरा भी पेट भर गया। मेरी तो वैसे भी महीने में चार-चार एकादशी हो जाती हैं। किन्तु मैं भी एक दाना ले ही लेता हूँ, जिससे कि भोलेबाबा के प्रसाद का अनादर न हो।" 
         यह कहकर जैसे ही भोला ने खीर के पात्र में लगा चावल का एक दाना उठाकर अपने कंठ में डाला, उसकी जन्म जन्मान्तर की भूख-प्यास मिट गई और समस्त वासनाओं और इच्छाओं की तृप्ति हो गई। उसके ज्ञान के नेत्र खुल गए और उसने देखा कि उसके सम्मुख त्रिलोकीनाथ भगवान् शंकर और जगज्जननी माँ पार्वती आशीर्वाद की मुद्रा में मुस्कराते हुए खड़े हैं।
         भोला दौड़कर उनके चरणों में लोट गया। लोटता गया, लोटता गया, और उन्हीं में समा गया।
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                           "ॐ नमः शिवाय्"

अनोखी कहानियां | 02 | "राधाजी का धरावतरण"

.   अनोखी कहानियां | 02 | "राधाजी का धरावतरण"

          पूर्वकाल में घटित यह प्रसंग गोलोकधाम का है। श्रीकृष्ण की तीन पत्नियाँ हुईं–श्रीराधा, विरजा और भूदेवी। इन तीनों में श्रीकृष्ण को श्रीराधा ही सबसे प्रिय हैं। 
          एक दिन भगवान श्रीकृष्ण एकान्त कुंज में विरजादेवी के साथ विहार कर रहे थे। श्रीराधा सखियों सहित वहाँ जाने लगीं। उस निकुंज के द्वार पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नियुक्त पार्षद श्रीदामा पहरा दे रहा था। श्रीदामा गोप ने उन्हें रोका। इस पर श्रीराधा क्रोधित हो गईं। सखियों का कोलाहल सुनकर श्रीकृष्ण वहाँ से अन्तर्धान हो गए। दु:खी होकर विरजाजी नदी बन गयीं और गोलोक में चारों ओर प्रवाहित होने लगीं। जैसे समुद्र इस भूतल को घेरे हुए है, उसी प्रकार विरजा नदी गोलोक को अपने घेरे में लेकर बहने लगीं। उनके व श्रीकृष्ण के जो सात पुत्र थे, वे लवण, इक्षु, सुरा, घृत, दधि, दुग्ध और जलरूप सात समुद्र होकर पृथ्वी पर आ गए।
          इस पर श्रीराधा ने श्रीदामा को शाप दे दिया कि ‘तुम असुरयोनि को प्राप्त हो जाओ और गोलोक से बाहर चले जाओ।’ तब श्रीदामा ने भी श्रीराधा को यह शाप दिया कि ‘श्रीकृष्ण सदा तुम्हारे अनुकूल रहते हैं, इसीलिए तुम्हें इतना मान हो गया है। आप भी मानवी-योनि में जायँ। वहाँ गोकुल में श्रीहरि के ही अंश महायोगी रायाण नामक एक वैश्य होंगे। आपका छायारूप उनके साथ रहेगा। अत: पृथ्वी पर मूढ़ लोग आपको रायाण की पत्नी समझेंगे, अत: परिपूर्णतम परमात्मा श्रीकृष्ण से भूतल पर कुछ समय आपका वियोग हो जाएगा।’
          इस प्रकार परस्पर शाप देकर अपनी ही करनी से भयभीत होकर श्रीदामा और श्रीराधा दोनों ही दु:खी हुए और चिन्ता में डूब गए। तब स्वयं श्रीकृष्ण वहाँ प्रकट हुए। श्रीकृष्ण ने श्रीदामा को सान्त्वना देते हुए कहा–’तुम त्रिभुवनविजेता सर्वश्रेष्ठ शंखचूड़ नामक असुर होओगे और अंत में श्रीशंकरजी के त्रिशूल से मृत्यु को प्राप्त होकर यहाँ मेरे पास लौट आओगे।’
          भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीराधा से कहा–’वाराहकल्प में मैं पृथ्वी पर जाऊँगा और व्रज में जाकर वहाँ के पवित्र वनों में तुम्हारे साथ विहार करूँगा। मेरे रहते तुमको क्या चिन्ता है ? श्रीदामा के शाप की सत्यता के लिए कुछ समय तक बाह्यरूप से मेरे साथ तुम्हारा वियोग रहेगा।’
          ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने गोपों और गोपियों को बुलाकर कहा–’गोपों और गोपियो ! तुम सब-के-सब नन्दरायजी का जो उत्कृष्ट व्रज है, वहाँ गोपों के घर-घर में जन्म लो। राधिके ! तुम भी वृषभानु के घर अवतार लो। वृषभानु की पत्नी का नाम कलावती है। वे सुबल की पुत्री हैं और लक्ष्मी के अंश से प्रकट हुई हैं। वास्तव में वे पितरों की मानसी कन्या हैं। पूर्वकाल में दुर्वासा के शाप से उनका व्रजमण्डल में गोप के घर में जन्म हुआ है। तुम उन्हीं कलावती की पुत्री होकर जन्म ग्रहण करो। नौ मास तक कलावती के पेट में स्थित गर्भ को माया द्वारा वायु से भरकर रोके रहो। दसवां महीना आने पर तुम भूतल पर प्रकट हो जाना। अपने दिव्यरूप का परित्याग करके शिशुरूप धारण कर लेना। तुम गोकुल में अयोनिजारूप से प्रकट होओगी। मैं भी अयोनिज रूप से अपने-आप को प्रकट करूँगा; क्योंकि हम दोनों का गर्भ में निवास होना सम्भव नहीं है। मैं बालक रूप में वहाँ आकर तुम्हें प्राप्त करूँगा। तुम मुझे प्राणों से भी अधिक प्यारी हो और मैं भी तुम्हें प्राणों से बढ़कर प्यारा हूँ। हम दोनों का कुछ भी एक-दूसरे से भिन्न नहीं है। हम सदैव एकरूप हैं। भूतल का भार उतारकर तुम्हारे और गोप-गोपियों के साथ मेरा पुन: गोलोक में आगमन होगा।’
          यह सुनकर श्रीराधा प्रेम से विह्वल होकर रो पड़ीं और श्रीकृष्ण से कहने लगीं–’मायापते ! यदि आप भूतल पर मुझे भेजकर माया से आच्छन्न कर देना चाहते हो तो मेरे समक्ष सच्ची प्रतिज्ञा करो कि मेरा मनरूपी मधुप तुम्हारे मकरन्दरूप चरणारविन्द में ही नित्य-निरन्तर भ्रमण करता रहे। जहाँ-जहाँ जिस योनि में भी मेरा यह जन्म हो, वहाँ-वहाँ आप मुझे अपना स्मरण एवं दास्यभाव प्रदान करोगे।’
          ‘जैसे शरीर छाया के साथ और प्राण शरीर के साथ रहते हैं, उसी प्रकार हम दोनों का जन्म और जीवन एक-दूसरे के साथ बीते। मैं तुम्हारी मुरली को ही अपना शरीर मानती हूँ और मेरा मन तुम्हारे चरणों से कभी विलग नहीं होता है। अत: विरह की बात कान में पड़ते ही आँखों का पलक गिरना बन्द हो गया है और हम दोनों आत्माओं के मन, प्राण निरन्तर दग्ध हो रहे हैं।’
          भगवान श्रीकृष्ण ने कहा–’राधे ! सारा ब्रह्माण्ड आधार और आधेय के रूप में विभक्त है। इनमें भी आधार से पृथक् आधेय की सत्ता संभव नहीं है। मेरी आधारस्वरूपा तुम हो; क्योंकि मैं सदा तुम में ही स्थित रहता हूँ। हम दोनों में कहीं भेद नहीं है; जहाँ आत्मा है, वहाँ शरीर है। मेरे बिना तुम निर्जीव हो और तुम्हारे बिना मैं अदृश्य हूँ। तुम्हारे बिना मैं संसार की सृष्टि नहीं कर सकता, ठीक उसी तरह जैसे कुम्हार मिट्टी के बिना घड़ा नहीं बना सकता और सुनार सोने के बिना आभूषण नहीं बना सकता। अत: आँसू बहाना छोड़ो और निर्भीक भाव से गोप-गोपियों के समुदाय के साथ बृषभानु के घर पधारो। मैं मथुरापुरी में वसुदेव के घर आऊँगा। फिर कंस के भय का बहाना बनाकर गोकुल में तुम्हारे समीप आ जाऊँगा।’
          श्रीगर्ग संहिता के अनुसार श्रीराधा ने श्रीकृष्ण से कहा–’प्रभो ! जहाँ वृन्दावन नहीं है, यमुना नदी नहीं हैं और गोवर्धन पर्वत भी नहीं है, वहाँ मेरे मन को सुख नहीं मिलता।’
          श्रीराधिकाजी के इस प्रकार कहने पर भगवान श्रीकृष्ण ने अपने गोलोकधाम से चौरासी कोस भूमि, गोवर्धन पर्वत एवं यमुना नदी को भूतल पर भेजा।
          श्रीराधा भगवान श्रीकृष्ण की सात बार परिक्रमा और सात बार प्रणाम करके गोप-गोपियों के समूहों के साथ भूतल पर अवतरित हुईं। श्रीराधा की प्रिय सखियाँ व श्रीकृष्ण के प्रिय गोप बहुत बड़ी संख्या में लीला के लिए व्रज में गोपों के घर उत्पन्न हुए।
          यह सब श्रीराधा और श्रीकृष्ण की लीला ही है, जो व्रज में परम दिव्य प्रेम की रसधारा बहाने के लिए निमित्त रूप से की गयी थी। इसी कारण से लीलामय श्रीकृष्ण और श्रीराधा वाराहकल्प में पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए।
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                         "जय जय श्री राधे"

अनोखी कहानियां | 01 | राधाकृष्ण का अनूठा प्रेम

.                      राधाकृष्ण का अनूठा प्रेम

          राधाजी और श्रीकृष्ण का प्रेम अलौकिक था। राधा कृष्ण के प्रेम को सांसारिक दृष्टि से देखेंगे तो समझ ही नहीं पायेंगे। इसे समझने को तो पहले आपको राधा और कृष्ण दोनों से स्वयं प्रेम करना होगा।
          श्रीकृष्ण का हृदय तो व्रज में ही रहता था परन्तु उनकी बहुत सी लीलाएँ शेष थीं। इसलिए उन्हें द्वारका जाना पड़ा। गए तो थे यह कहकर कि कुछ ही दिनों में वापस ब्रजलोक आयेंगे, पर द्वारका के राजकाज में ऐसे उलझे कि मौका ही नहीं मिल पाया। राधा कृष्ण दूर-दूर थे।
          गोपाल अब राजा बन गए थे। स्वाभाविक है कि राजकाज के लिए समय देना ही पड़ता। स्वयं भगवान ही जिन्हें राजा के रूप में मिल गए हों उनकी प्रसन्नता की कोई सीमा होगी। द्वारकावासी दिनभर उन्हें घेरे रहते। जो एकबार दर्शन कर लेता वह तो जाने का नाम नहीं लेता। बार-बार आता। प्रभु मना कैसे करें और क्यों करें?
ब्रज से दूर श्रीकृष्ण हमेशा अकेलापन महसूस करते। उन्हें गोकुल और व्रज हमेशा याद आता। जिस भी व्रजवासी के मन में अपने लल्ला से मिलने की तीव्र इच्छा होती श्रीकृष्ण उसे स्वप्न में दर्शन दे देते। स्वप्न में आते तो उलाहना मिलती, इतने दिनों से क्यों नहीं आए। यही सिलसिला था। भक्त और भगवान वैसे तो दूर-दूर थे। फिर भी स्वप्न में ही दर्शन हों जायें, तो ऐसे भाग्य को कोई कैसे न सराहे।
          श्रीकृष्ण से विरह से सबसे ज्यादा व्याकुल तो राधाजी थीं। राधा और कृष्ण मिलकर राधेकृष्ण होते थे पर दोनों भौतिक रूप से दूर थे। ‘श्रीजी की चरण सेवा’ की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज से जुड़े रहें तथा अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें।
          एक दिन की बात है। राधाजी सखियों संग कहीं बैठी थीं। अचानक एक सखी की नजर राधाजी के पैर पर चली गई। पैर में एक घाव से खून बह रहा था।
          राधा जी कै पैर में चोट लगी है, घाव से खून बह रहा है। सभी चिन्तित हो गए कि उन्हें यह चोट लगी कैसे। लगी भी तो किसी को पता क्यों न चला।
          सबने राधा जी से पूछा कि यह चोट कैसे लगी? राधाजी ने बात टालनी चाहा। अब यह तो इंसानी प्रवृति है आप जिस बात को जितना टालेंगे, लोग उसे उतना ही पूछेंगे।
          राधा जी ने कहा–एक पुराना घाव है। वैसे कोई खास बात है नहीं। चिंता न करो सूख जाएगा।
          सखी ने पलटकर पूछ लिया–पुराना कैसे मानें? इससे तो खून बह रहा है। यदि पुराना है, तो अब तक सूखा क्यों नहीं ? यह घाव कैसे लगा, कब लगा? क्या उपचार कर रही हो ? जख्म नहीं भर रहा कहीं कोई दूसरा रोग न हो जाए!
          एक के बाद एक राधाजी से सखियों ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी। उन्हें क्या पता, जिन राधाजी की कृपा से सबके घाव भरते हैं, उन्हें भयंकर रोग भला क्या होगा!
          राधाजी समझ गईं कि अगर उत्तर नहीं दिया तो यह प्रश्न प्रतिदिन होगा। इसलिए कुछ न कुछ कहके पीछा छुड़ा लिया जाए, उसी में भला है।
          राधा जी बोलीं–एक दिन मैंने खेल-खेल में कन्हैया की बांसुरी छीन ली। वह अपनी बांसुरी लेने मेरे पीछे दौड़े। बांसुरी की छीना-झपटी में अचानक उनके पैर का नाखून मेरे पांव में लग गया। यह घाव उसी चोट से बना है। ‘श्रीजी की चरण सेवा’ की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज से जुड़े रहें तथा अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें।
          राधा जी ने गोपियों को बहलाने का प्रयास तो किया पर सफल नहीं रहीं। किसी ने भी उनकी इस बात का विश्वास न किया। प्रश्नों से भाग रही थीं, अब पलटकर फिर से प्रश्न शुरू हो गए।
          सखियों ने पूछा–यदि यह घाव कान्हा के पैरों के नाखून से हुआ तो अबतक सूखा क्यों नहीं? कान्हा को गए तो कई बरस हो गए हैं। इतने में तो कोई भी घाव सूख जाए। देखो कुछ छुपाओ मत। हमसे छुपा न सकोगी। आज नहीं तो कल पता तो चल ही जाएगा। सो अच्छा है कि आज ही बता दो।
          राधा जी समझ गईं कि सखियों को आधी बात बताकर बहलाया नहीं जा सकता। वह तो अपने कन्हैया से आज ही रात स्वप्न में पूछ लेंगी। बात तो खुल ही जाएगी इसलिए बता ही देना चाहिए।
          राधा जी बोलीं–घाव सूखता तो तब न, जब मैं इसे सूखने देती। मैं रोज इसे कुरेदकर हरा कर देती हूँ।
          सखियों की तो आँख फटी रह गई ये सुनकर कि राधा जी घाव को हरा कर रही हैं। यह तो बड़ी विचित्र बात हुई। सबके चेहरे पर एक साथ कई भाव आए। अब राधा जी से फिर से प्रश्नों की झड़ी लगने वाली थी। इससे पहले कि कोई कुछ कहे राधाजी ने ही बात पूरी कर दी।
          राधाजी थोड़े दुखी स्वर में बोलीं–कान्हा रोज सपने में आकर इस घाव का उपचार कर देते हैं। घाव के उपचार के लिए ही सही, कन्हैया मेरे सपनों में आते तो हैं। अगर यह सूख गया तो क्या पता वह सपने में भी आना छोड़ दें।
          प्रभु दूर बैठे सब सुन रहे थे। उनकी आँखों में आँसू भर आए। वहीं पास में उद्धव जी बैठे थे। उन्होंने प्रभु की आँखों से छलकते आँसू देख लिए। 
उद्धवजी हैरान-परेशान हो गए। सबके आँसू दूर करने वाले श्रीकृष्ण रो रहे हैं। यह क्या हो रहा है। कौन सा अनिष्ट देख लिया। कौन सा अनिष्ट घटित होने वाला है। उद्धवजी चाह तो नहीं रहे कि प्रभु के नितान्त निजी बात में हस्तक्षेप करें पर कौतूहल भी तो है।
          उद्धवजी स्वयं को रोक ही न पाए। उन्होंने श्रीकृष्ण से आँसू का कारण पूछ ही लिया। भगवान ने भी अपने सखा उद्धव से कुछ भी न छुपाया। सारी बात साफ-साफ बता दी।
          उद्धव को यकीन नहीं हुआ कि ब्रजवासी श्रीकृष्ण से इतना प्रेम करते हैं। भगवान नित्य उन्हें सपने में जाते हैं। उनके उलाहने लेते हैं, उनका उपचार करते हैं। इतनी फुर्सत कहाँ है इन्हें। यह सब भाव उद्धव के मन में आ रहे थे। भगवान उद्धव की शंका ताड़ गए।
          उन्होंने उद्धव से कहा–उद्धव आप तो परमज्ञानी हैं। किसी को भी अपने वचन से सन्तुष्ट कर सकते हैं। मेरे जाने से पहले आप एक बार ब्रज हो आइए। ब्रजवासियों को अपनी वाणी से मेरी विवशता के बारे में समझाकर शांत करिए। उसके बाद मैं जाऊँगा।
          उद्धव ब्रज गए। उन्हें गर्व था कि वह ज्ञानी हैं और किसी को भी अपनी बातों से समझा लेंगे। चिकनी-चुपड़ी बातों से गोपियों को समझाने की कोशिश की। गोपियों ने इतनी खिंचाई की, कि सारा ज्ञान धरा का धरा रह गया।
          गोपियों के मन भगवान के प्रति प्रेम देखकर वह स्तब्ध रह गए। द्वारका में श्रीकृष्ण के आँसू देखकर जो शंका की थी उसके लिए बड़े लज्जित हुए।
          गोपियों ने श्रीकृष्ण से अपने प्रेमभाव का जो वर्णन शुरू किया तो उद्धव की आँखें स्वयं झर-झरकर बहने लगीं। वह भाव-विभोर हो गए। राधा और कृष्ण के बीच अलौकिक प्रेम को उद्धव ने तभी समझा।
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                           "जय जय श्री राधे"

बांके बिहारी जी | 01 | भक्त के कार्य

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          वृन्दावन में एक गरीब ब्राह्मण रहता था। वह बाँकेबिहारी से असीम प्यार करता था। वह बाँकेबिहारी का इतना दीवाना था कि सुबह शाम जब तक वह मन्दिर ना जाए उसे किसी भी काम में मन नहीं लगता था। मन्दिर में जब भी भंडारा होता वह प्रमुख रूप से भाग लेता।
          एक दिन ब्राह्मण की बेटी की शादी तय हो गई और  जिस दिन ब्राह्मण की बेटी की शादी तय हुई उसी दिन ब्राह्मण की बाँकेबिहारी के मन्दिर में भी ड्यूटी लग गई। ब्राह्मण परेशान हो गया कि, वह करे तो क्या करे। बेटी की शादी भी जरूरी है, और बाँकेबिहारी की आज्ञा भी ठुकरा नहीं सकता।  ब्राह्मण ने सोचा कि अगर यह बात वह अपनी पत्नी से बताएगा, तो उसकी पत्नी नाराज हो जाएगी। वह कहेगी कि, कोई क्या अपनी बेटी की शादी भी छोड़ता है। एक दिन अगर तुम भंडारे में नहीं जाओगे, तो भंडारा रुक नहीं जाएगा। कोई और संभाल लेगा लेकिन बेटी की शादी दोबारा तो नहीं होगी।
          ब्राह्मण परेशान हो गया था वह जानता था कि कुछ भी हो जाएगा, उसकी पत्नी उसे भंडारे में जाने नहीं देगी।  लेकिन उसका मन नहीं मान रहा था, वह अपने बाँकेबिहारी से नजरे नहीं चुरा सकता था। बेटी की शादी के दिन ब्राह्मण अपने घर में बिना बताए चुपचाप समय से पहले ही मन्दिर पहुँच चुका था।
          मन्दिर में जाकर प्यार से सब को भंडारा खिलाया और शाम होते ही जल्दी से घर वापस पहुँचा क्योंकि बेटी की शादी में भी पहुँचना था लेकिन  ब्राह्मण को पहुँचते-पहुँचते देर हो चुकी थी और बिटिया की शादी हो कर बिटिया की विदाई भी हो चुकी थी।
          वह घर पहुँचा तो उसकी पत्नी उसे बोली आओ चाय पी लो बहुत थक चुके होंगे। सोचने लगा कि घर वाले कोई भी उसे डांट नहीं रहे हैं, और ना ही परिवार के कोई भी सदस्य उससे कोई सवाल कर रहा है कि वह शादी में नहीं था। फिर भी पत्नी सही से उसे प्यार से बात कर रही थी।
          ब्राह्मण ने भी सोचा छोड़ो क्या गड़े मुर्दे उखाड़ना है जो हो गया सो हो गया। सब प्रभु की इच्छा है, पत्नी अगर प्यार से बात कर रही है इससे अच्छी बात क्या है। 
          कुछ दिनों के बाद बेटी की शादी में जो फोटोग्राफी हुई थी फोटोग्राफर शादी का एल्बम घर पर दे गया। ब्राह्मण सोचा इस शादी में तो शरीक हुआ नहीं था चलो एल्बम देख लेता हूँ बेटी की शादी कैसी हुई थी। मगर यह क्या वह तो देख रहा है इस शादी में हर जगह उसकी भी तस्वीर है।  ब्राह्मण फूट-फूट कर रोने लगा और बाँकेबिहारी के मन ही मन याद करने लगा और कहने लगा प्रभु तेरी यह कैसी कृपा है।
          अगले दिन बाँकेबिहारी के मन्दिर गया और मन्दिर में जाकर खूब रोया और बाँकेबिहारी से कहने लगा चाहे कुछ भी हो जाए अब मैं तुम्हारा नियमित सेवा करता रहूँगा। मैं मान गया कि जो भगवान में भक्ति करता है भगवान उसे कभी भी अकेला नहीं छोड़ते हैं बल्कि हर जगह बाँकेबिहारी खड़े हो जाते हैं।
          इसीलिए भक्तों हमें भी चाहिए कि हम भी ऐसा ही दृढ़ प्यार और भरोसा अपने भगवान और गुरु पर रखें भगवान हमें कभी भी गलत नहीं करने देते।
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                       "जय जय श्री राधे"

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