अयोध्या महाराज दशरथ की राजधानी थी जो भगवान राम लक्ष्मण भरत और शत्रुघ्न के पिता थे यहीं से मुनि विश्वामित्र श्री रामचंद्र जी को और लक्ष्मण जी को यज्ञ रक्षा के लिए अपने साथ लेकर गए थे।
पूरा ग्रंथों के वर्णन अध्ययन से पता चलता है कि भगवान राम ने जिन जिन स्थानों की यात्रा की उनमें दृश्यों का उन्हें प्रत्यक्ष मार्गदर्शन प्राप्त हुआ यह आप कई स्थानों पर उदाहरण से देख सकते हैं जैसे प्रयागराज में ऋषि भारद्वाज उन्हें चित्रकूट जाने के लिए कहते हैं तथा मार्ग बताने के लिए अपने चार शिष्यों को उनके साथ भेजते हैं महर्षि बाल्मीकि ने चित्रकूट में निवास का परामर्श देते हैं क्योंकि तब तक रावण के भाई करने चित्रकूट तक पहुंच चुका था चित्रकूट से वह अत्री जी के आश्रम आते हैं और 3जी के आश्रम में श्री राम को विराट के क्षेत्र में भेजते हैं जहां से सरबंग आश्रम तक ऋषि मंडली उनके साथ रहती है सरवन आश्रम से सिद्ध पहाड़ के आगे कई तपस्वी उनके साथ रहते हैं जो शिक्षण आश्रम तक जाते हैं जब से राम 10 वर्ष के दंडक भ्रमण पर जाते हैं तो धर्म धर्म तथा अन्य ऋषि उनके साथ साथ रहते हैं वापस सुतीकण आश्रम आने पर मुनि उन्हें अगस्त जी के भाई तथा आकाश जी के आश्रम पर जाने के लिए कहते हैं ऋषि अगस्त्य उन्हें पंचवटी भेजते हैं या घर से उनका युद्ध होता है सीता हरण के के बाद व्हीकल लोन आदि ऋषि उन्हें उनका मार्गदर्शन करते हैं ऋषि अगस्त्य तो लंका तक जाकर युद्ध में उनका उत्साहवर्धन करते हैं इस प्रकार निसंदेह हम कह सकते हैं कि श्री राम की यात्रा विषयों के मार्गदर्शन में हुई थी इस प्रकार श्री राम वन गमन की खोज भी संतों की कृपा तथा आशीर्वाद से हुई है कुछ विद्वान इन मार्गों या स्थलों के प्रमाण मांगते हैं वह पूछते हैं कि उत्खनन में क्या मिला सिक्के बर्तन आदि कितने पुराने हैं किस इतिहासकार ने इन स्थलों की पुष्टि की है मुझे इन पर हंसी आती है पुरातत्व विभाग के पूर्व निदेशक डॉ स्वराज प्रकाश गुप्त का संकेत निर्देश स्मरण आ जाता है हम पुरातत्व वेता मानते हैं कि महाभारत की घटना 5000 वर्ष पूर्व की है रामायण 3000 वर्ष पूर्व की है इस बात का हमारे पास कोई उत्तर नहीं है कि महाभारत में रामायण के पात्रों की चर्चा कैसे आ गई सत्य भी है कि पुरातत्व का विद्वान वही मानेगा जोशी खनन से मिलेगा कितना पुराना कितना गहरा कहां हो इसी प्राण ठीक नहीं हो पाते सभी की अपनी सीमा होती है फिर इतने पुराने अवशेष मिलना भी संभव नहीं और फिर जो मिलता है उस पर क्या किसी का नाम लिखा है बस एक धारणा ही तो है तो फिर क्या आधार हो सकता है हां एक बहुत बड़ा आधार है लोक विश्वास जनश्रुति या लोक कथाएं इस लोक विश्वास कोने तो मंदिरों मठों की भांति तोड़ा जा सकता नहीं पश्चिम की आंधी तथा उत्तर के आक्रमण इन्हें इतिहास लेखन की तरह निर्मित कर सकें इन्हें नालंदा तक्षशिला विद्यालय कि विश्वविद्यालय के ग्रंथ आकार की तरह जलाया भी नहीं जा सका।यह तो जन-जन की चेतना में पीढ़ी दर पीढ़ी पूर्वजों से मिली धरोहर है जो आज भी हमारी भारतीय संस्कृति हिंदू संस्कृति या आर्य संस्कृति अथवा जो भी कहे की रक्षा कर रही है श्री राम की कहानी तो हमारे प्राचीन ग्रंथों में बहुत ही विस्तार एवं प्रभावी ढंग से मिलती है श्रीराम प्रातः स्मरण से साईं सोनेदड़ बदन श्री राम नाम सत्य तक सभी इससे प्रभावित हैं।
श्री राम की यात्रा स्थल अथवा मार्ग पुस्तकालय में बैठकर यात्रा ग्रंथों को पढ़कर नहीं खोजे गए हैं बल्कि शहरों जंगलों आदि स्थानों में घूम कर वहां के निवासियों से एकत्रित किंवदंतियों आदि के संग्रह हैं प्राप्त लोक कथा तथा जनश्रुति ने स्थानीय प्रभाव तथा काल के प्रभाव को बहुत सहायक बनाया है जो हमारे इस तथ्य में सहयोगी बने हैं अनेक कथाएं चलती चलती लोग हो गई होंगी तो भी बीज तो बचा ही है अब यह शोधार्थियों का दायित्व है कि सार सार को गहि रहे थोथा देई उड़ाय किंतु यह कार्य पुस्तकालय में।
इन स्थानों को जब मानचित्र पर अंकित करते हैं तो एक मार्ग जैसा बनता दिखाई देता है और यह मार्ग बाल्मीकि रामायण के वर्णन से मेल खाता है श्री राम जी अयोध्या जी से सुतीक्षण आश्रम तक सीधे ही गए थे हां चित्रकूट प्रवास में आसपास अवश्य घूमते रहे थे सुतीक्षण जी से भेंट के बाद वे दंडकारण्य में 10 वर्ष तक भ्रमण करते रहे मुनियों के आश्रम में गए जहां से उन्हें बहुत प्यार हो गया था वहां दो दो बार गए तथा पुणे सुतीक्षण जी के आश्रम में आ गए थे उन 10 वर्षों का मार्ग बनाना संभव ही नहीं लगता क्योंकि आश्रमों तथा सभी विषयों के नामों का वर्णन नहीं मिल पाता है महर्षि ने मार्ग का संकेत दिसावर पर्वतों के बाद यम से दिया है मार्ग में आने वाले यह पर्वत भी छोटे तो हैं नहीं बल्कि बड़े भू-भाग में फैले हुए हैं फिर भी इन पर्वतों में मार्ग खोजना आसान काम नहीं है।
फिर भी हमें ऐसा आभास होता है कि इन पर्वतों से किस प्रकार निर्माण मिला होगा मार्ग में ऋषि यों के अनेक आश्रम मिले हैं श्रीराम इनमें से किस में गए किसी एक में गए अथवा शादी में गए कुछ संकेत नहीं मिलता पुराणों में वर्णन है कि श्रीराम ने बहुत बार तीर्थ यात्राएं की हैं अमुक स्थान पर श्री राम आए थे यह तो पता चलता है किंतु वनवास मात्रा में आए थे या तीर्थ यात्रा में यह पता लगाना कठिन है किंतु इसका भी एक मार्ग निकलता है पंचवटी के बाद जहां श्री राम के साथ सीता जी बियाई स्थान तीर्थ यात्रा से संबंधित हैं अन्य स्थलों पर हनुमान जी का साथ होना निश्चित रूप से तीर्थ यात्रा से संबंधित स्थल है अयोध्या जी से पंचवटी तक जहां भी श्री राम लक्ष्मण जी तथा सीता जी हैं वह स्थल वनवास यात्रा से संबंधित हैं पंचवटी के आगे जिनी स्थलों पर केवल श्री राम लक्ष्मण कथा किष्किंधा से आगे जहां श्री राम लक्ष्मण सुग्रीव हनुमान स्थान भी वनवास यात्रा से संबंधित हैं।
मार्ग में नदियों का महत्व
श्री राम वनवास मार्ग निर्धारण में नदियों का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान है बालकि रामायण में तमसा मंडा वेद श्रुति विश्वजीत गोमती इस बंदी का सही
श्रृंगी आश्रम शेरवा घाट फैजाबाद उत्तर प्रदेश।
शेरवा घाट के पास महबूब गंज से लगभग 3 किलोमीटर उत्तर दिशा में सरयू नदी के तट पर प्राचीन श्रृंगी आश्रम है यदि सरयू के किनारे किनारे आए तो यह स्थल अयोध्या जी से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर पड़ता है यहां अनेक संतों के कुटिया आश्रम बने हुए संत जनों का मानना है कि ऋषि विश्वामित्र जी ने इसी स्थान पर श्री राम जी को बला तथा अति बला नाम की विधाएं प्रदान की थी यह भी माना जाता है कि उस समय भी यहां अनेक ऋषि रहते थे उन्हें के आश्रम में ऋषि विश्वामित्र ने श्री राम लक्ष्मण के साथ विश्राम किया था।
पुत्रेष्टि यज्ञ स्थल मखोड़ा फैजाबाद उत्तर प्रदेश।
राजा दशरथ जी ने श्रृंगी ऋषि की सहायता से यहां पुत्रेष्टि यज्ञ किया था। यह स्थल मकोड़ा अर्थात मनोरमा फैजाबाद उत्तर प्रदेश में स्थित है इसे बेहद पवित्र माना जाता है और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
भैरव मंदिर महाराजगंज आजमगढ़ उत्तर प्रदेश।
ऐसा माना जाता है कि यदि सरयू के किनारे किनारे जाया जाए तो इस स्थान पर पहुंचा जा सकता है माना जाता है कि महाराजगंज के निकट प्राचीन भैरव मंदिर में भगवान श्रीराम ने रात्रि विश्राम किया था क्योंकि उन्होंने यात्रा सरयू जी के तट के साथ साथ की थी और रात्रि विश्राम का वर्णन अनेक पूरा ग्रंथों में मिलता है तो यह निश्चित रूप से हम कह सकते हैं कि वे इसी मार्ग से गए होंगे।