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श्री गुरूवे नमः
#यम
आज यम के विषय में भी हो जाए, यद्यपि ऋग्वेद में यम का वरुण बृहस्पति एवं अग्नि आदि देव के साथ उल्लेख किया गया है किंतु उनको अन्य देव की भांति ने तो सदा किसे अमर चित्रित किया गया है और ना ही यज्ञ उनसे उनका कोई विशेष संबंध है aउनकी धारणा एक मर्त्य मनुष्य के रूप में है जो भी विवस्वान के पुत्र हैं और पृथ्वी के सभी मनुष्य के पूर्वज हैं पृथ्वी पर सबसे पहले मरने के कारण स्वर्ग अथवा पितृलोक पहुंचे और वहां के राजा बन बैठे(ऋ०१०/१४/१)।
विवस्वान के पुत्र होने से यम के लिए वैवस्वत विशेषण प्राय प्रयुक्त हुआ है उनकी माता का नाम सरण्यू था जो एक यमज पुत्र पुत्री उत्पन्न करने के पश्चात चली गई थी ऋ०१०/१७/१व१०/१०/२ यम एवं उनकी बहन यमी को मानवीय जाति का आदि युग्म में कहा गया हैऋ०१०/१०/४ मे यमी अपने को एक गन्धर्व तथा एक अप्सरा का भी पुत्र बताती है अथर्ववेद१/८/३-१३ मैं कहां गया है कि यम मनुष्य में मरने वाले सर्वप्रथम व्यक्ति थे उन्होंने हम लोगों के लिए परलोक की खोज की है ऋ०१०/१३५ यम को मनुष्यों का पिता (पुर्वज) तथा विश्पति(राजा) कहा गया है।
यम का स्थान सर्वोच्च आकाश मे है वहाँ मधुमय जल स्रोत सदा बहते रहते है(ऋ०९/११३/८) उस स्थान मे केवल यम और वरूण दो राजा निवास करते है यम मनुष्यों के संगमन है अर्थात वे मनुष्यों (प्रेतात्माओ)को एक स्थान पर एकत्र करते हैं वे प्राय एक घने वृक्ष के नीचे बैठे रहते है ऋ०१०/१४/९ तथा अ० वेद१८/२/३७ मो उन्हें मृतको को अवसान अथवा आश्रय स्थान प्रदान करने वाला कहा गया हैऋ०१०/१३५/७ तथा १०/१४/१-२ ने कहा गया है कि यम का सदन सदा बंसी की तान से झंकृत रहता है की परलोक को जाने वाले मार्ग की खोज सबसे पहले यम ने की थी सबसे पहले वही ऊंचे नीचे मार्ग पर होते हुए वहां तक गये थे और बाद में उन्होंने अन्य मनुष्यों को भी वह मार्ग दिखाया मृत आत्माओं के राजा होने से यम को पितरों का अधिपति भी कहा गया है अंगिरस, नवग्वा वैरूप,अथर्वन तथा भृग गोत्रों के पितरों कायम के साथ विशेष उल्लेख किया गया है यह पित्र यम के साथ अत्यंत प्रसन्नता पूर्वक विचरण करते हैं।
ऋग्वेद के इस सुक्त में कुछ ऐसी ऋचा हैं जिनका यम के दुतों के घर में घुस जाने पर पाठ करने का विधान दिया गया है पर यम के प्रमुख दूत दो कुत्ते हैं यह देवशुनी सरमा के पुत्र हैं इनकी नाक लंबी है(उरूणसा) रंग चितकबरा है और प्रत्येक के चार चार नेत्र हैं यह अत्यंत बलशाली है यह मनुष्य के बीच में विचरण करते रहते हैं और उनका कार्य मृतप्राय व्यक्ति को अन्य व्यक्तियों से छटना है sदी मृतक के लोग गमन के मार्ग पर बैठे रहते हैं और बुरे व्यक्तियों को यमलोक में जाने ही नहीं देते इनके लिए पथिरक्षी विशेषण भी आया है ऋग्वेद में १०/१४/११और मृतक आत्माओं से इनको पार करके दूसरे अच्छे मार्ग से चले जाने को कहा गया है।
इतना होने पर भी ऋग्वेद में यम के स्वरूप में वह भयावहता नहीं है जो बाद में पाई जाती है यह ब्लॉक के अधिपति हैं वहां जाकर धर्मात्मा व्यक्ति शाश्वत आनंद का उपभोग करते हैं किंतु धीरे-धीरे यम एवं मृत्यु का तकात में अधिकाधिक प्रबल होता गया हैमै० सं२/५/६ और वा० सं०३९/१३ यम के लिए अंत तक एवं मृत्यु विशेषण प्रयुक्त हुए हैं यामाय स्वाहा अंतकाय स्वाहा मृत्येवे स्वाहा इसी प्रकार अथर्ववेद में मृत्यु को यम का दूध का गया है ऋग्वेद में नरक की कोई स्पष्ट अवधारणा प्राप्त नहीं होती किंतु पुराणादि को में नर्क की मान्यता पूर्णतया प्रतिष्ठित हो गई है तो यम को नर्क का अधिपति बना दिया गया है पुराणों मे यम की यमुना (नदी)नामक एक बहन भी बताई गई है ऋग्वेद में इसका नाम यमी है यम तथा उसकी बहन के विषय में ऋग्वेद के दशम मंडल का दशम सूक्त समस्त वैदिक साहित्य में अपने ढंग का अनोखा है इस सूक्त में मानव जाति के सर्वप्रथम युग्म यम और यमी का संवाद है जिसमे यमी यम को पारस्परिक संभोग के लिए प्रेरित करती है और यम बार-बार इस अनैतिक कार्य के लिए मना करते हैं अवेस्ता मे यम और यमी के प्रतिरूप यिम और यिमेह मे(परवर्ती साहित्य मे) परस्पर संयोग वर्णित किया गया है किन्तु ऋग्वेद के कवि ने ऐसा नही किया यमी के इस अनुचित अनुरोध पर यम कह कर चुप हो जाते है।
ऋग्वेद में यम का जो स्वरूप है इसका मूल आधार क्या है यह निश्चित पूर्वक नहीं कहा जा सकता इसमे मैक्समुलर का मत है के यम अस्तगत सूर्य को घोषित करता है वैदिक कवियों के लिए पूर्व दिशा जीवन की प्रतीक थी और पश्चिम निऋर्ति या मृत्यु के कारण८/६७/२० मे विवस्वान का मृत्यु से संबंध बताया गया है अस्ताचलगामी सूर्य सर्वप्रथम मरने वाला मर्त्य है जो उस समय काल के कथन के अनुसार किसी अज्ञात लोक में चला जाता है।कठ उपनिषद में यह एक महत्वपूर्ण शास्त्र प्रवक्ता के रूप में उपस्थित होते हैंh यहां उनका मृत्यु से पूर्णता तादात्म्य में किया गया है उद्दालक ऋषि अपने पुत्र नचिकेता से प्रसन्न से प्रसन्न होकर कहते हैं मृत्यवे त्वचा ददामीति नचिकेता सोचता है र्किस्विद् यमस्य कर्त्तव्यं यन्ममाध करिष्यति मे फिर उसके लिए मृत्यु संबोधन आया है त्वं च मृत्यो नचिकेता यम के प्रासाद में तीन दिन तक रहता है किंतु यहां भी कहीं नरक का उल्लेख नहीं है लगता है अभी यम नरकाधिपति के रूप में प्रतिष्ठित नहीं हुए थे नचिकेता उनसे मृत्यु के अनंन्तर आत्मा की स्थिति के विषय में प्रशन करता है।
यम के भयंकर रूप से सबसे पहले हम रामायण के उत्तरकांड से परिचित होते हैं यहां उन्हें कालपाशो से युक्त था और अग्नि तथा वज्र के समान भयानक बताया गया है इनके दर्शन मात्र से ही जिवो के प्राण निकल जाते हैं। उत्तरकांड के बीच में नगर में नाराजगी यम के स्वरूप का चित्रण जिन शब्दों में करते हैं उनसे यम की शक्ति का परम उत्कर्ष सूचित होता है आयु के क्षीण होने पर इंद्र सहित तीनों लोगों के प्राणी यम से पीड़ित होते हैं जो मनुष्य द्वारा किए गए कर्मों के साक्षी हैं उन्हीं से संसार के प्राणी चेतना प्राप्त करके संचार में विभिन्न चेष्टा करते हैं भी पाप पुण्य के फल देने वाले हैं तीनों लोग उनके बस में हैं और उनसे सदा भयभीत रहते हैं।
रामायण में यमलोक स्वर्ग नहीं है अब यह नर्क में परिवर्तित हो गया है जहां सब प्राणी अपने कर्मों के अनुरूप यम के पुरुषों से विविध प्रकार की यात्रा एवं क्लेश प्राप्त करते हैं यम के पुरुष अत्यंत उग्र तथा घोर हैं और इनका रूप भी भयंकर है।
उत्तरकांड में प्राणियों की यात्रा का वर्णन निश्चित रूप से पुराणों के समकालीन है उनसे प्राचीन नहीं क्योंकि उत्तर कांड का यह भाग रामायण के सबसे बाद में जोड़ा हुआ अंश माना जाता है फिर भी यह श्लोक नरक में दी जाने वाली आत्माओं का जिनका अन्य पुराणों में विशिष्ट गरुड़ पुराण के प्रेत कल्पना विस्तार से उल्लेख किया गया है प्रतिनिधि वर्णन प्रस्तुत करते हैं वहां बहुत से प्राणी कराह रहे हैं और बहुत से रोते तथा चिल्लाते हैं उसको तो कुत्ते नोच रहे हैं कुछ को कीड़े काट रहे हैंo बहुत से रुधिर से भरी वैतरणी पार कर रहे हैं और कुछ बालू में भुने जा रहे हैं उ० रा०२१/१८-२० इन श्लोकों में पुण्यात्माओं द्वारा यमपुरी में बोले जाने वाले सुख तथा ऐश्वर्यो का वर्णन है इस प्रकार रामायण के अनुसार मनुष्य को अपनी सत्कर्म एवं दुष्य कर्मों का फल यमपुरी में ही मिल जाता है तो यहां यह प्रश्न उठता है किस पृथ्वी लोक पर जीव क्या करने के लिए आता है जब नर्क और स्वर्ग किसी और लोक में हैं तो इस मृत्युलोक का क्या रहस्य है महाभारत के युद्ध यमराज के अवतार हैं।
और इन्हें प्राणियों को दंड स्वरूप कष्ट देने पर भी पाप नहीं लगता पुराणों में और भी बहुत सी कथाएं जैसे भगवान कृष्ण संयमनी जाकर अपने गुरु संदीपनि के पुत्र को यम से मांग करते हैं यम की कल्पना एक काले एवं भयंकर शरीर वाले पुरुष के रूप में की गई है परंतु वे पितांबर तथा सोने के आभूषण धारण किए रहते हैं उनके एक हाथ में कालपाश है जिससे वे प्राणियों के सूक्ष्म शरीर को मानते हैं और दूसरे हाथ में मुद्गर की आकृति का दंड है जो राजत्व सूचक है उनका वाहन महिष है तथा काल और मृत्यु नामक उनके दो परिचर हैं
ऋग्वेद में यम के जिन दो कुत्तों का वर्णन किया है उनका ब्रह्मपुराण अध्याय १३१ में भी उल्लेख किया हुआ है यहां भी उन्हें सरमा के पुत्र मनुष्यों के पीछे चलने वाले चार आंखों वाले पवन भक्षण करने वाले तथा उनके प्रिय कहा गया है किंतु उनका कार्य अब केवल देवो की गाय की गायों की अन्य जीवो की रक्षा करना है यानी वेदों में कुछ और कार्य और पुराणों में कुछ और आगे वर्णन है यम से उनका केवल नाम मात्र को संबंध रह गया है आगे ब्रह्मपुराण ३४ वे श्लोक के अनुसार अपनी माता को साथ मिलने पर भी अपने स्वामी यम से उसकी निष्कृति का उपाय पूछते है। पर ऋग्वेद में जहां उल्लुक और कपोत को यम का पक्षी बताया गया है।
वह रामायण में का स्थान पर काक ले लिया है काला और अशुभ होने के कारण यह यम का पक्षी होने के सर्वथा उपयुक्त भी है रा० उ०१८/२६-२७ नियम अपने इस पक्षी को भर देते हुए कहते हैं कि जिस प्रकार में अन्य प्राणियों को विविध रोगों से पीड़ित करता हूं उस प्रकार तुम्हें नहीं करूंगा मेरे वर से तुम्हें मृत्यु का भय भी नहीं रहेगा आज भी लोक विश्वास है कि कौवा रूम कभी नहीं मरता उसकी मृत्यु तभी होती है जब कोई उसकी हत्या कर डाले पितरों का यम से संबंध होने के कारण आज भी पितृपक्ष में यम के इस पक्षी को उड़द आदि से बने पदार्थों की बलि दी जाती है।
पर यम के हाथ से पितरों का अधिपत्य अब छिन चुका है पितरों का स्वामी अब अर्यमा माना जाता हैभ० गी०१०/२९ किंतु इन अर्यमां का निवास स्थान भी यमलोक में ही है भा०५/२६/५ भागवत मे यम को परम विष्णु भक्त चित्रित किया गया है जब अजामिल के प्राण निकालने वाले दुत विष्णु पार्षदों द्वारा प्रतिषिद्ध होने पर यम के पास जाकर सारी घटना का वर्णन करते हैंतो वे परम प्रसन्न होकर उनसे विष्णु के माहात्म्य का वर्णन करते हैं भाग० ६/३/१२-३३ भागवत धर्म के तत्व को जानने वाले बारह व्यक्तियों मे यम की भी गणना की गई है कठोपनिषद मेयम का दार्शनिक ज्ञान के उपदेष्टा के रूप में जो व्यक्तित्व है उसका प्रतिबिंब महाकाव्य एवं पुराणों से भी प्राप्त होता है महाभारत के शांति पर्व १२९ वीं अध्याय में यह महरिशी गौतम को निश्रेयस का उपदेश देते हैं अनु० १३०/१४-३३ मैं भी इनके द्वारा धर्म के रहस्य का वर्णन कराया गया है अन०१७/१७८ तथा६८/१६-२२ जी इस संबंध में महत्वपूर्ण हैभाग०७/२/२५ तै० ब्रा० मैं यम उशीनर देश के राजा सुयज्ञ के मरने पर विलाप करती हुई रानियों को सांत्वना देने के लिए एक बालक के रूप में आते हैं और संसार के चक्र का वर्णन करते हैं।
इसी प्रकार मत्स्य० ४९/६८ मैं भी भी जनमेजय की वीरता से प्रसन्न होकर उसे मुक्ति प्रदान करते हैं वृहन्नारदीय पुराण मैं इनकी आकृति बड़ी विचित्र बताई गई है और इन्हें ३२ भुजाओं से युक्त तीन योजन विस्तृत दीर्घ नासिका वाले तथा बड़ी-बड़ी लाल आंखों से युक्त बताया गया हैk कायस्थवंशीय चित्रगुप्त को अपना आदि पुरुष मानते हैं और यम द्वितीया को धूमधाम से इनकी एवं लेखनी मसीपात्र आदि लेखन सामग्री की पूजा करते हैं यम द्वितीया का दिन परवर्ती हिंदू धर्म में भैया दूज के पर्व के रूप में विकसित हुआ है उस दिन भाई बहन के घर जाता है दोनों मिलकर यमुना(सूर्य पुत्री, यमभगिनी) अथवा किसी अन्य नदी में स्नान करते हैं बहन भाई के टीका करती है और भाई बहन को वस्त्र अलंकार आदि भेंट देता है पुराणों का कहना है कि इस दिन बहन से टीका कराने से यम की यात्नाओं से मुक्ति मिल जाती है यम और यमी ( यमुना) अब भाई-बहन के पवित्र स्नेह की दैवी प्रतीक है।