नल और दमयन्ती की कथा का भव्य वर्णन भारत के महाकाव्य, महाभारत में मिलता है। आज हम उसी कहानी को आपके लिए वर्णित करते हैं।
युधिष्ठिर को जुए में अपना सब-कुछ गँवा कर अपने भाइयों के साथ वनवास करना पड़ा। वहीं एक ऋषि ने उन्हें नल और दमयन्ती की कथा सुनायी।
इस कथा में प्रेम और पीड़ा का ऐसा प्रभावशाली पुट है कि भारत के ही नहीं देश-विदेश के लेखक व कवि भी इससे आकर्षित हुए बिना न रह सके और उन्होंने भारतीय संस्कृति कि इस सुंदर कथा को अपने अपने तरीके से लोगों के सामने प्रस्तुत किया।
नल निषाद देश के राजा वीरसेन के पुत्र थे। नल बड़े वीर और सुन्दर, शस्त्र-विद्या तथा अश्व-संचालन अर्थात सारथी विद्या में वे बड़े ही निपुण थे। वे बड़े ही गुणवान्, सत्यवादी तथा ब्राह्मण भक्त थे। निषाद देश से जो लोग विदर्भ देश में आते थे, वे महाराज नल के गुणों की प्रशंसा करते नहीं थकते थे। इसी प्रकार दमयंती की रूप और सौंदर्य की चर्चा भी चारों ओर फैली हुई थी। नल भी उसके सौंदर्य की प्रशंसा सुनकर मन ही मन उससे प्रेम करने लगा।
यह दमयंती कौन थी आई है बताते हैं। उन्हीं दिनों विदर्भ (पूर्वी महाराष्ट्र) पर भीष्मक नाम के एक राजा राज्य करते थे। उनके एकमात्र पुत्री थी। जिसका नाम दमयन्ती था। दमयन्ती लक्ष्मी के समान रूपवती, बहुत ही सुन्दर और गुणवान थी।
यह प्रशंसा दमयन्ती के कानों तक भी पहुँची थी। इसी तरह विदर्भ देश से आने वाले लोग राजकुमारी के रूप और गुणों की चर्चा महाराज नल के समक्ष करते। इसका परिणाम यह हुआ कि नल और दमयन्ती एक-दूसरे के प्रति आकृष्ट होते गये।
उनके प्रेम सन्देश को एक हंस ने दमयन्ती के पास बड़ी कुशलता से इस प्रकार पहुंचाया कि बिना देखे दमयन्ती भी अपने उस अनजान प्रेमी की विरह में जलने लगी।
दूसरा भाग
आइए अब हम आपको पुराणों में वर्णित नल दमयंती की कहानी को सुनाते हैं।
जय नामक ग्रंथ में महर्षि वेदव्यास ने जो वर्णन किया है उसे हम श्रीमद्के साथ साथ हम महाभारत के नाम से भी जानते हैं इसी महाभारत में एक चक्रवर्ती राजा हुए जिनका नाम युधिष्ठिर था।
उनके कौरव भाइयों ने उन्हें धोखे से द्यूतकीड़ा में हराकर , वनवास के लिए भेज दिया। इसी वनवास के दौरान धर्मराज युधिष्ठिर महर्षि बृहदश्व से मिले। उन्होंने अपनी ही तरह परेशानी उठाने वाली किसी राजा की कहानी सुनाने का आग्रह किया तब उनके आग्रह करने पर महर्षि बृहदश्व ने नल-दमयन्ती की कथा सुनाई।
धर्मराज ! निषाद देश में वीरसेन नाम की एक राजा थे उनके पुत्र नल हुए जो बड़े ही गुणवान्, परम सुन्दर, सत्यवादी, जितेन्द्रिय, सबके प्रिय, वेदज्ञ एवं ब्राह्मणभक्त थे। उनकी सेना बहुत बड़ी थी। वे स्वयं अस्त्रविद्या और शस्त्र विद्या में बहुत निपुण थे। वे वीर, योद्धा, उदार हृदय वाले और प्रबल पराक्रमी भी थे। उन्हें द्यूतकीड़ा अर्थात चौसर खेलने का भी कुछ-कुछ शौक था।
उन्हीं दिनों विदर्भ देश में भीम नाम के एक राजा राज्य करते थे। इस समय विदर्भ देश की राजधानी कुण्डिनपुर थी। ये भी सर्वगुण सम्पन्न और पराक्रमी थे।
उन्होंने दमन ऋषि को प्रसन्न करके उनके वरदान से चार संतानें प्राप्त की थीं—तीन पुत्र और एक पुत्री। उन्होंने अपने पुत्रों के नाम —दम, दान्त, और दमन रखें जबकि अपनी पुत्री का नाम था—दमयन्ती रखा।
दमयन्ती लक्ष्मी के समान रूपवती थी। उसके नेत्र विशाल थे। देवताओं और यक्षों में भी वैसी सुन्दरी कन्या कहीं देखने में नहीं मिलती थी।
उन दिनों कितने ही लोग विदर्भ देश से निषध देश में आते और राजा नल के सामने दमयन्ती के रूप और गुण का बखान करते। निषाद देश से विदर्भ में जाने वाले भी दमयन्ती के सामने राजा नल के रूप, गुण और पवित्र चरित्र का वर्णन करते। इस प्रकार दोनों के हृदय में पारस्परिक प्रेम और अनुराग अंकुरित हो गया।
एक दिन राजा नल ने अपने महल के उद्यान में कुछ हंसों को देखा। उन्होंने एक हंस को पकड़ लिया। परंतु यह क्या हंस तो बोलने लगा। हंस ने कहा—‘आप मुझे छोड़ दीजिये। मैं अपनी पत्नी के ग्रह में जिंदा नहीं रह सकता। यदि संभव हुआ तो हम आपके किसी ने किसी काम अवश्य आएंगे।'
नल को हंस पर दया आ गई और उन्होंने उसे छोड़ दिया। दयालु राजा को चिंतित देखकर हंस ने उनसे कहा ' राजन! आप कुछ चिंतित दिखाई देते हैं हमें अपनी चिंता बताइए।'
राजा ने कहा ' मैंने दमयंती के बारे में बहुत कुछ सुना है। मैं चाहता हूं कि मुझे उसकी कुछ खबर अवश्य मिले। जिस प्रकार अपने हंसिनी को प्रेम करते हो उसी प्रकार मैं भी दमयंती से मन ही मन प्रेम करने लगा हूं। बस यही मेरी चिंता है। '
उसने कहा, 'राजन! आप चिंता ना करें, हम दमयन्ती के पास जाकर आपके गुणों का ऐसा वर्णन करेंगे कि वह आपको अवश्य वर लेगी।’
राजा ने उसकी बात सुनकर कहा, यह आंसुओं के राजा मैं आप सबको अपने इस राज उपवन में स्वतंत्रता पूर्वक विचरण करने की आज्ञा देता हूं ।आपको यहां कोई परेशान नहीं करेगा । आप जब तक चाहे जहां रहे।
हंसों ने कुछ दिनों तक वहां पर स्वतंत्र विचरण किया उसके उपरांत, सब हंस उड़कर विदर्भ देश की ओर उड़ गये।
तीसरा भाग
दमयन्ती अपने उपवन में हंसों को देखकर बहुत प्रसन्न हुई और हंसों को पकड़ने के लिये उनकी ओर दौड़ने लगी। दमयन्ती जिस हंस को पकड़ने के लिये दौड़ती, वही बोल उठता कि ‘अरी दमयन्ती ! निषाद देश में एक नल नाम का राजा है। वह अश्विनीकुमार के समान सुन्दर है। मनुष्यों में उसके समान सुन्दर और कोई नहीं है। वह मानो मूर्तिमान् कामदेव है। यदि तुम उसकी पत्नी हो जाओ तो तुम्हारा जन्म और रूप दोनों सफल हो जायँ। हम लोगों ने देवता, गंधर्व, मनुष्य, सर्प और राक्षसों को घूम-घूमकर देखा है। नल के समान कहीं सुन्दर पुरुष देखने में नहीं आया। जैसे तुम स्त्रियों में रत्न हो, वैसे ही नल पुरुषों में भूषण है। तुम दोनों की जोड़ी बहुत ही सुन्दर होगी।’
हम सबको बोलता सुनकर दमयंती भी हतप्रभ रह गई तब दमयन्ती ने कहा—‘हंस ! तुम नल से भी ऐसी ही बात कहना। अब तुम मेरे इस उपवन में निवास करने के लिए स्वतंत्र हो गई यहां तुम्हें कोई परेशान नहीं करेगा।’
कुछ दिन वहां रहने के उपरांत वे निषाद देश लौटकर आए और उन्होंने नल से दमयन्ती का संदेश कह दिया।
इस प्रकार दमयन्ती हंस के मुँह से राजा नल की कीर्ति सुनकर उनसे प्रेम करने लगी। उसकी आसक्ति इतनी बढ़ गयी कि वह रात-दिन उनका ही ध्यान करती रहती। शरीर धूमिल और दुबला हो गया। वह दीन-सी दीखने लगी। सखियों ने दमयन्ती के हृदय का भाव ताड़कर विदर्भराज से निवेदन किया कि ‘आपकी पुत्री अस्वस्थ हो गयी है।’
राजा भीम ने अपनी पुत्री के सम्बन्ध में बड़ा विचार किया। अन्त में वह इस निर्णय पर पहुँचे कि मेरी पुत्री विवाहयोग्य हो गयी है, इसलिये इसका स्वयंवर कर देना चाहिये। उन्होंने सब राजाओं को स्वयंवर का निमन्त्रण-पत्र भेज दिया और सूचित कर दिया कि राजाओं को दमयन्ती के स्वयंवर में पधारकर लाभ उठाना चाहिये और मेरा मनोरथ पूर्ण करना चाहिये।
देश-देश के नरपति हाथी, घोड़े और रथों की ध्वनि से पृथ्वी को मुखरित करते हुए सज-धजकर विदर्भ देश में पहुँचने लगे। भीम ने सबके स्वागत सत्कार की समुचित व्यवस्था की।
देवर्षि नारद और पर्वत के द्वारा देवताओं को भी दमयन्ती के स्वयंवर का समाचार मिल गया। इन्द्र आदि सभी लोकपाल भी अपनी मण्डली और वाहनों सहित विदर्भ देश के लिये रवाना हुए।
राजा नल का चित्त पहले से ही दमयन्ती पर आसक्त हो चुका था। उन्होंने भी दमयन्ती के स्वयंवर में सम्मिलित होने के लिये विदर्भ देश की यात्रा की।
देवताओं ने स्वर्ग से उतरते समय देख लिया कि कामदेव के समान सुन्दर नल दमयन्ती के स्वयंवर के लिये जा रहे हैं। नल की सूर्य के समान कान्ति और लोकोत्तर रूप-सम्पत्ति से देवता भी चकित हो गये। उन्होंने पहिचान लिया कि ये नल हैं। उन्होंने अपने विमानों को आकाश में खड़ा कर दिया और नीचे उतरकर नल से कहा—‘राजेन्द्र नल ! आप बड़े सत्यव्रती हैं। आप हम लोगों की सहायता करने के लिए दूत बन जाइये।’
नल ने प्रतिज्ञा कर ली और कहा कि ‘आप जो चाहेंगे मैं वही करूँगा’। फिर राजा ने पूछा कि ‘आप लोग कौन हैं और मुझे दूत बनाकर कौन-सा काम लेना चाहते हैं ?’
इन्द्र ने कहा—‘हमलोग देवता हैं। मैं इन्द्र हूँ और ये अग्नि, वरुण और यम हैं। हम लोग दमयन्ती के लिये यहाँ आये हैं और उससे विवाह करना चाहते हैं।
देवताओं ने नल से कहा कि आप हमारे दूत बनकर दमयन्ती के पास जाइये और कहिए, 'इन्द्र, वरुण, अग्नि और यमदेवता तुम्हारे पास आकर तुमसे विवाह करना चाहते हैं। इनमें से तुम चाहे जिस देवता को पति के रूप में स्वीकार कर लो।’
नल ने दोनों हाथ जोड़कर कहा कि ‘देवराज’ ! वहाँ आप लोगों के और मेरे जाने का एक ही प्रयोजन है। इसलिये आप मुझे दूत बनाकर वहाँ भेजें, यह उचित नहीं है। जिसकी किसी स्त्री को पत्नी के रूप में पाने की इच्छा हो चुकी हो, वह भला, उसको कैसे छोड़ सकता है और उसके पास जाकर ऐसी बात कह ही कैसे सकता है ? आप लोग कृपया इस विषय में मुझे क्षमा कीजिये।'
चौथा भाग
दमयन्ती का स्वयंवर और विवाह
दमयन्ती का स्वयंवर हुआ जिसमें न केवल धरती के राजा, बल्कि देवता भी नल का रूप धरकर आ गए। स्वयंवर में एक साथ कई नल खड़े थे। सभी परेशान थे कि असली नल कौन होगा। लेकिन दमयन्ती जरा भी विचलित नहीं हुई। उसने आंखों से ही असली नल को पहचान लिया। सारे देवताओं ने भी उनका अभिवादन किया। इस तरह आंखों में झलकते भावों से ही दमयंती ने असली नल को पहचानकर अपना जीवनसाथी चुन लिया। नव-दम्पत्ति को देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त हु्आ। दमयन्ती निषाद-नरेश राजा नल की महारानी बनी। दोनों बड़े सुख से समय बिताने लगे।
दमयन्ती पतिव्रताओं में शिरोमणि थी। अभिमान तो उसे कभी छू भी न सकता था। समयानुसार दमयन्ती के गर्भ से एक पुत्र और एक कन्या का जन्म हुआ। दोनों बच्चे माता-पिता के अनुरूप ही सुन्दर रूप और गुणसे सम्पन्न थे। समय सदा एक-सा नहीं रहता, दुःख-सुख का चक्र निरन्तर चलता ही रहता है। वैसे तो महाराज नल गुणवान्, धर्मात्मा तथा पुण्यश्लोक थे, किन्तु उनमें एक दोष था —जुए का व्यसन। नल के एक भाई का नाम पुष्कर था। वह नल से अलग रहता था। उसने उन्हें जुए के लिए आमन्त्रित किया। खेल आरम्भ हुआ। भाग्य प्रतिकूल था। नल हारने लगे, सोना, चाँदी, रथ, राजपाट सब हाथ से निकल गया। महारानी दमयन्ती ने प्रतिकूल समय जानकर अपने दोनों बच्चों को विदर्भ देश की राजधानी कुण्डिनपुर भेज दिया।
इधर नल जुए में अपना सर्वस्व हार गये। उन्होंने अपने शरीर के सारे वस्त्राभूषण उतार दिये। केवल एक वस्त्र पहनकर नगर से बाहर निकले। दमयन्ती ने भी मात्र एक साड़ी में पति का अनुसरण किया। एक दिन राजा नल ने सोने के पंख वाले कुछ पक्षी देखे। राजा नल ने सोचा, यदि इन्हें पकड़ लिया जाय तो इनको बेचकर निर्वाह करने के लिए कुछ धन कमाया जा सकता है। ऐसा विचारकर उन्होंने अपने पहनने का वस्त्र खोलकर पक्षियों पर फेंका। पक्षी वह वस्त्र लेकर उड़ गये। अब राजा नल के पास तन ढकने के लिए भी कोई वस्त्र न रह गया। नल अपनी अपेक्षा दमयन्ती के दुःख से अधिक व्याकुल थे। एक दिन दोनों जंगल में एक वृक्ष के नीचे एक ही वस्त्र से तन छिपाये पड़े थे। दमयन्ती को थकावट के कारण नींद आ गयी। राजा नल ने सोचा, दमयन्ती को मेरे कारण बड़ा दुःख सहन करना पड़ रहा है। यदि मैं इसे इसी अवस्था में यहीं छोड़कर चल दूँ तो यह किसी तरह अपने पिताके पास पहुँच जायगी।
यह विचारकर उन्होंने तलवार से उसकी आधी साड़ी को काट लिया और उसी से अपना तन ढककर तथा दमयन्ती को उसी अवस्था में छोड़ कर वे चल दिये। जब दमयन्ती की नींद टूटी तो बेचारी अपने को अकेला पाकर करुण विलाप करने लगी। भूख और प्यास से व्याकुल होकर वह अचानक अजगर के पास चली गयी और अजगर उसे निगलने लगा। दमयन्ती की चीख सुनकर एक व्याध ने उसे अजगर का ग्रास होने से बचाया। किंतु व्याध स्वभाव से दुष्ट था। उसने दमयन्ती के सौन्दर्य पर मुग्ध होकर उसे अपनी काम-पिपासा का शिकार बनाना चाहा। दमयन्ती उसे शाप देते हुए बोली—‘यदि मैंने अपने पति राजा नल को छोड़कर किसी अन्य पुरुष का कभी चिन्तन न किया हो तो इस पापी व्याध के जीवन का अभी अन्त हो जाय। दमयन्ती की बात पूरी होते ही व्याध मृत्यु को प्राप्त हुआ।
दैवयोग से भटकते हुए दमयन्ती एक दिन चेदिनरेश सुबाहु के पास और उसके बाद अपने पिता के पास पहुँच गयी। अंततः दमयन्ती के सतीत्व के प्रभाव से एक दिन महाराज नल के दुःखो का भी अन्त हुआ। दोनों का पुनर्मिलन हुआ और राजा नल को उनका राज्य भी वापस मिल गया।
पाकदर्पण भोजन बनाने की कला (पाककला) से सम्बन्धित एक प्राचीन संस्कृत ग्रन्थ है। इसके रचयिता राजा नल माने जाते हैं। इसलिए इसे 'नलपाक' भी कहते हैं।
इसमें ११ अध्याय एवं ७६० श्लोक हैं जिनमें राजाओं के रसोईघरों में प्रयुक्त पाकशास्त्र का वर्णन है।
दमयन्ती विदर्भ नरेश भीम की पुत्री थ जो हंस द्वारा गुण श्रवण करके नॅषधराज नल पर अनुरक्त हो गई थी। उसने स्वयम्बर में देवताओं तथा अन्य राजाओं को छोडकर नल को ही वरमाला पहनाई। परिणाम स्वरूप कुपित होकर कलि ने उन्हें अनेक कष्ट दिए। नैषधीयचरित के अनुसार इंद्र ने इन्हें एक वर भी प्रदान किया था। तदनंतर राजा नल और दमयंती के विहार का वर्णन मिलता है। वे रति क्रिया ने तल्लीन हुये।।
विदर्भ देश में भीष्मक नाम के एक राजा राज्य करते थे। उनकी पुत्री का नाम दमयन्ती थी। दमयन्ती लक्ष्मी के समान रूपवती थी। उन्हीं दिनों निषध देश में वीरसेन के पुत्र नल राज्य करते थे। वे बड़े ही गुणवान्, सत्यवादी तथा ब्राह्मण भक्त थे। निषध देश से जो लोग विदर्भ देश में आते थे, वे महाराज नल के गुणों की प्रशंसा करते थे। यह प्रशंसा दमयन्ती के कानों तक भी पहुँची थी। इसी तरह विदर्भ देश से आने वाले लोग राजकुमारी के रूप और गुणों की चर्चा महाराज नल के समक्षकरते। इसका परिणाम यह हुआ कि नल और दमयन्ती एक-दूसरे के प्रति आकृष्ण होते गये।
नल-दमयंती कथा
दमयन्ती का स्वयंवर हुआ। जिसमें न केवल धरती के राजा, बल्कि देवता भी आ गए। नल भी स्वयंवर में जा रहा था। देवताओं ने उसे रोककर कहा कि वो स्वयंवर में न जाए। उन्हें यह बात पहले से पता थी कि दमयंती नल को ही चुनेगी। सभी देवताओं ने भी नल का रूप धर लिया। स्वयंवर में एक साथ कई नल खड़े थे। सभी परेशान थे कि असली नल कौन होगा। लेकिन दमयंती जरा भी विचलित नहीं हुई, उसने आंखों से ही असली नल को पहचान लिया। सारे देवताओं ने भी उनका अभिवादन किया। इस तरह आंखों में झलकते भावों से ही दमयंती ने असली नल को पहचानकर अपना जीवनसाथी चुन लिया। नव-दम्पत्ति को देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त हु्आ। दमयन्ती निषध-नरेश राजा नल की महारानी बनी। दोनों बड़े सुख से समय बिताने लगे। दमयन्ती पतिव्रताओं में शिरोमणि थी।
अभिमान तो उसे कभी छू भी न सकता था। समयानुसार दमयन्ती के गर्भ से एक पुत्र और एक कन्या का जन्म हुआ। दोनों बच्चे माता-पिता के अनुरूप ही सुन्दर रूप और गुणसे सम्पन्न थे समय सदा एक-सा नहीं रहता, दुःख-सुख का चक्र निरन्तर चलता ही रहता है। वैसे तो महाराज नल गुणवान्, धर्मात्मा तथा पुण्यस्लोक थे, किन्तु उनमें एक दोष था।—जुए का व्यसन। नल के एक भाई का नाम पुष्कर था। वह नल से अलग रहता था। उसने उन्हें जुए के लिए आमन्त्रित किया। खेल आरम्भ हुआ। भाग्य प्रतिकूल था। नल हारने लगे, सोना, चाँदी, रथ, राजपाट सब हाथ से निकल गया। महारानी दमयन्ती ने प्रतिकूल समय जानकर अपने दोनों बच्चों को विदर्भ देशकी राजधानी कुण्डिनपुर भेज दिया।
इधर नल जुए में अपना सर्वस्व हार गये।। उन्होंने अपने शरीर के सारे वस्त्राभूषण उतार दिये। केवल एक वस्त्र पहनकर नगर से बाहर निकले। दमयन्ती ने भी मात्र एक साड़ी में पति का अनुसरण किया। एक दिन राजा नल ने सोने के पंख वाले कुछ पक्षी देखे। राजा नल ने सोचा, यदि इन्हें पकड़ लिया जाय तो इनको बेचकर निर्वाह करने के लिए कुछ धन कमाया जा सकता है। ऐसा विचारकर उन्होंने अपने पहनने का वस्त्र खोलकर पक्षियों पर फेंका। पक्षी वह वस्त्र लेकर उड़ गये। अब राजा नल के पास तन ढकने के लिए भी कोई वस्त्र न रह गया। नल अपनी अपेक्षा दमयन्ती के दुःख से अधिक व्याकुल थे। एक दिन दोनों जंगल में एक वृक्ष के नीचे एक ही वस्त्र से तन छिपाये पड़े थे। दमयन्ती को थकावट के कारण नींद आ गयी। राजा नल ने सोचा, दमयन्ती को मेरे कारण बड़ा दुःख सहन करना पड़ रहा है। यदि मैं इसे इसी अवस्था में यहीं छोड़कर चल दूँ तो यह किसी तरह अपने पिताके पास पहुँच जायगी।
यह विचारकर उन्होंने तलवार से उसकी आधी साड़ी को काट लिया और उसी से अपना तन ढककर तथा दमयन्ती को उसी अवस्था में छोड़ कर वे चल दिये। जब दमयन्ती की नींद टूटी तो बेचारी अपने को अकेला पाकर करुण विलाप करने लगी। भूख और प्यास से व्याकुल होकर वह अचानक अजगर के पास चली गयी और अजगर उसे निगलने लगा। दमयन्ती की चीख सुनकर एक व्याध ने उसे अजगर का ग्रास होने से बचाया। किंतु व्याध स्वभाव से दुष्ट था। उसने दमयन्ती के सौन्दर्य पर मुग्ध होकर उसे अपनी काम-पिपासा का शिकार बनाना चाहा। दमयन्ती उसे शाप देते हुए बोली—‘यदि मैंने अपने पति राजा नल को छोड़कर किसी अन्य पुरुष का चिन्तन किया हो तो इस पापी व्याध के जीवन का अभी अन्त हो जाय।’ दमयन्ती की बात पूरी होते ही व्याध के प्राण-पखेरू उड़ गये। दैवयोग से भटकते हुए दमयन्ती एक दिन चेदिनरेश सुबाहु के पास और उसके बाद अपने पिता के पास पहुँच गयी। अंततः दमयन्ती के सतीत्व के प्रभाव से एक दिन महाराज नल के दुःखो का भी अन्त हुआ। दोनों का पुनर्मिलन हुआ और राजा नल को उनका राज्य भी वापस मिल गया।
व्याध के मर जाने के बाद दमयंती एक निर्जन और भयंकर वन में जा पहुंची।
राजा नल का पता पूछती हुई वह उत्तर की ओर बढऩे लगी। तीन दिन रात दिन रात बीत जाने के बाद दमयंती ने देखा कि सामने ही एक बहुत सुन्दर तपोवन है। जहां बहुत से ऋषि निवास करते हैं। उसने आश्रम में जाकर बड़ी नम्रता के साथ प्रणाम किया और हाथ जोड़कर खड़ी हो गई। ऋषियों को प्रणाम किया। ऋषियों ने दमयन्ती का सत्कार किया और उसे बैठने को कहा- दमयन्ती ने एक भद्र स्त्री के समान सभी के हालचाल पूछे।
फिर ऋषियों ने पूछा आप कौन है तब दमयंती ने अपना पूरा परिचय दिया और अपनी सारी कहानी ऋषियों को सुनाई। तब सारे तपस्वी उसे आर्शीवाद देते हैं कि थोड़े ही समय में निषध के राजा को उनका राज्य वापस मिल जाएगा। उसके शत्रु भयभीत होंगे व मित्र प्रसन्न होंगे और कुटुंबी आनंदित होंगे। इतना कहकर सभी ऋषि अंर्तध्यान हो गए।
रानी ने मुश्किल समय में भी रख दी शर्त क्योंकि….
दमयंती रोती हुई एक अशोक के वृक्ष के पास पहुंचकर बोली तू मेरा शोक मिटा दे। शोक रहित अशोक तू मेरा शोक मिटा दे। क्या कहीं तूने राजा नल को शोक रहित देखा है। तू अपने शोकनाशक नाम को सार्थक कर।दमयन्ती ने अशोक की परिक्रमा की और वह आगे बढ़ी। उसके बाद आगे बड़ी तो बहुत दूर निकल गई। वहां उसने देखा कि हाथी घोड़ों और रथों के साथ व्यापारियों का एक झुंड आगे बढ़ रहा है। व्यापारियों के प्रधान से बातचीत करके दमयंती को जब यह पता चला कि वे सभी चेदीदेश जा रहे हैं तो वह भी उनके साथ हो गई। कई दिनों तक चलने के बाद वे व्यापारी एक भयंकर वन में पहुंचे। वहा एक बहुत सुंदर सरोवर था। लंबी यात्रा के कारण वे लोग थक चुके थे। इसलिए उन लोगों ने वहीं पड़ाव डाल दिया। रात के समय जंगली हाथियों का झुंड आया। आवाज सुनकर दमयंती की नींद टूट गई। वह इस दृश्य को देखकर समझ नहीं पा रही थी कि वह क्या करे? वे सभी व्यापारी मर गए वो वहां से भाग निकली और दमयंती भागकर ब्राह्मणों के पास पहुंची और उनके साथ चलने लगी शाम के समय वह राजा सुबाहु के यहां जा पहुंची। वहां उसे सब बावली समझ रहे थे। उसे बच्चे परेशान कर रहे थे।
उस समय राज माता महल के बाहर खिड़की से देख रही थी उन्होंने अपनी दासी से कहा देखो तो वह स्त्री बहुत दुखी मालुम होती है। तुम जाओ और मेरे पास ले आओ। दासी दमयंती को रानी के पास ले गई। रानी ने दमयंती स पूछा तुम्हे डर नहीं लगता ऐसे घुमते हुए। तब दमयंती ने बोला में एक पतिव्रता स्त्री हूं। मैं हूं तो कुलीन पर दासी का काम करती हूं। तब रानी ने बोला ठीक है तुम महल में ही रह जाओ। तब दमयंती कहती है कि मैं यहां रह तो जाऊंगी पर मेरी तीन शर्त है मैं झूठा नहीं खाऊंगी, पैर नहीं धोऊंगी और परपुरुष से बात नहीं करुंगी। रानी ने कहा ठीक है हमें आपकी शर्ते मंजुर है।
जैसे ही राजा ने कहा दश सांप ने डंस दिया…
जिस समय राजा नल दमयन्ती को सोती छोड़कर आगे बढ़े, उस समय वन में आग लग रही थी। तभी नल को आवाज आई। राजा नल शीघ्र दौड़ो। मुझे बचाओ। नागराज कुंडली बांधकर पड़ा हुआ था। उसने नल से कहा- राजन मैं कर्कोटक नाम का सर्प हूं। मैंने नारद मुनि को धोखा दिया था। उन्होंने शाप दिया कि जब तक राजा नल तुम्हे न उठावे, तब तक यहीं पड़े रहना। उनके उठाने पर तू शाप से छूट जाएगा। उनके शाप के कारण मैं यहां से एक भी कदम आगे नहीं बढ़ सकता। तुम इस शाप से मेरी रक्षा करो। मैं तुम्हे हित की बात बताऊंगा और तुम्हारा मित्र बन जाऊंगा। मेरे भार से डरो मत मैं अभी हल्का हो जाता हूं वह अंगूठे के बराबर हो गया। नल उसे उठाकर दावानल से बाहर ले आए। कार्कोटक ने कहा तुम अभी मुझे जमीन पर मत डालो। कुछ कदम गिनकर चलो। राजा नल ने ज्यो ही पृथ्वी पर दसवां कदम चला और उन्होंने कहा दश तो ही कर्कोटक ने उन्हें डस लिया। उसका नियम था कि जब कोई बोले दश तभी वह डंसता था।
आश्चर्य चकित नल से उसने कहा महाराज तुम्हे कोई पहचान ना सके इसलिए मैंने डस के तुम्हारा रूप बदल दिया है। कलियुग ने तुम्हे बहुत दुख दिया है। अब मेरे विष से वह तुम्हारे शरीर में बहुत दुखी रहेगा। तुमने मेरी रक्षा की है। अब तुम्हे हिंसक पशु-पक्षी शत्रु का कोई भय नहीं रहेगा। अब तुम पर किसी भी विष का प्रभाव नहीं होगा और युद्ध में हमेशा तुम्हारी जीत होगी।
और राजा बन गया सारथी
यह कहकर कर्कोटक ने दो दिव्य वस्त्र दिए और वह अंर्तध्यान हो गया। राजा नल वहां से चलकर दसवें दिन राजा ऋतुपर्ण की राजधानी अयोध्या में पहुंच गया। उन्होंने वहां राजदरबार में निवेदन किया कि मेरा नाम बाहुक है। मैं घोड़ों को हांकने और उन्हें तरह-तरह की चालें सिखाने का काम करता हूं। घोड़ो की विद्या मेरे जैसा निपुण इस समय पृथ्वी पर कोई नहीं है। रसोई बनाने में भी में बहुत चतुर हूं, हस्तकौशल के सभी काम और दूसरे कठिन काम करने की चेष्ठा करूंगा।
आप मेरी आजीविका निश्चित करके मुझे रख लीजिए। उसकी सारी बात सुनकर राजा ऋतुपर्ण ने कहा बाहुक मैं सारा काम तुम्हें सौंपता हूं। लेकिन मैं शीघ्रगामी सवारी को विशेष पसंद करता हूं। तुम्हे हर महीने सोने की दस हजार मुहरें मिला करेंगी। लेकिन तुम कुछ ऐसा करो कि मेरे घोड़ों कि चाल तेज हो जाए। इसके अलावा तुम्हारे साथ वाष्र्णेय और जीवल हमेशा उपस्थित रहेंगें।
राजा नल रोज दमयन्ती को याद करते और दुखी होते कि दमयन्ती भूख-प्यास से परेशान ना जाने किस स्थिति में होगी। इसी तरह राजा नल ने दमयंती के बारे में सोचते हुए कई दिन बिता दिए। ऋतुपर्ण के पास रहते हुए उन्हें कोई ना पहचान सका। जब राजा विदर्भ को यह समाचार मिला कि मेरे दामाद नल और पुत्री राज पाठ विहिन होकर वन में चले गए हैं।
राजमाता ने कैसे पहचाना रानी को?
तब उन्होंने सुदेव नाम के एक ब्राह्मण को नल-दमयंती का पता लगाने के लिए चेदिनरेश के राज्य में भेजा। उसने एक दिन राज महल में दमयंती को देख लिया। उस समय राजा के महल में पुण्याहवाचन हो रहा था। दमयंती- सुनन्दा एक साथ बैठकर ही वह कार्यक्रम देख रही थी। सुदेव ब्राह्मण ने दमयंती को देखकर सोचा कि वास्तव में यही भीमक नन्दिनी है। मैंने इसका जैसा रूप पहले देखा था। वैसा अब भी देख रहा हूं। बड़ा अच्छा हुआ, इसे देख लेने से मेरी पुरी यात्रा सफल हो गई। सुदेव दमयंती के पास गया और उससे बोला दमयंती मैं तुम्हारे भाई का मित्र सुदेव हूं। मैं तुम्हारी भाई की आज्ञा से तुम्हे ढ़ूढने यहां आया हूं। दमयंती ने ब्राह्मण को पहचान लिया। वह सबका कुशल-मंगल पूछने लगी और पूछते ही पूछते रो पड़ी।
सुनन्दा दमयंती को रोता देख घबरा गई। उसने अपनी माता के पास जाकर उन्हें सारी बात बताई। राज माता तुरंत अपने महल से बाहर निकल कर आयी। ब्राह्मण के पास जाकर पूछने लगी महाराज ये किसकी पत्नी है? किसकी पुत्री है? अपने घर वालों से कैसे बिछुड़ गए? तब सुदेव ने उनका पूरा परिचय उसे दिया। सुनन्दा ने अपने हाथों से दमयंती का ललाट धो दिया। जिससे उसकी भौहों के बीच का लाल चिन्ह चन्द्रमा के समान प्रकट हो गया। उसके ललाट का वह तिल देखकर सुनन्दा व राजमाता दोनों ही रो पड़े। राजमाता ने कहा मैंने इस तिल को देखकर पहचान लिया कि तुम मेरी बहन की पुत्री हो। उसके बाद दमयंती अपने पिता के घर चली गई।
तब खत्म हुई रानी की खोज
अपने पिता के घर एक दिन विश्राम करके दमयंती अपनी माता से कहा कि मां मैं आपसे सच कहती हूं। यदि आप मुझे जीवित रखना चाहती हैं तो आप मेरे पतिदेव को ढूंढवा दीजिए। रानी ने उनकी बात सुनकर नल को ढूंढवाने के लिए ब्राह्मणों को नियुक्त किया। ब्राह्मणों से दमयंती ने कहा आप लोग जहां भी जाए वहां भीड़ में जाकर यह कहे कि मेरे प्यारे छलिया, तुम मेरी साड़ी में से आधी फाड़कर अपनी दासी को उसी अवस्था में आधी साड़ी में आपका इंतजार कर रही है। मेरी दशा का वर्णन कर दीजिएगा और ऐसी बात कहिएगा।
जिससे वे प्रसन्न हो और मुझ पर कृपा करे। बहुत दिनों के बाद एक ब्राह्मण वापस आया। उसने दमयंती से कहा मैंने राजा ऋतुपर्ण के पास जाकर भरी सभा में आपकी बात दोहराई तो किसी ने कुछ जवाब नहीं दिया। जब मैं चलने लगा तब बाहुक नाम के सारथि ने मुझे एकान्त में बुलाया उसके हाथ छोटे व शरीर कुरूप है। वह लम्बी सांस लेकर रोता हुआ मुझसे कहने लगा।
उच्च कुल की स्त्रियों के पति उन्हें छोड़ भी देते हैं तो भी वे अपने शील की रक्षा करती हैं। त्याग करने वाला पुरुष विपत्ति के कारण दुखी और अचेत हो रहा था। इसीलिए उस पर क्रोध करना उचित नहीं है। लेकिन वह उस समय बहुत परेशान था।जब वह अपनी प्राणरक्षा के लिए जीविका चाह रहा था। तब पक्षी उसके वस्त्र लेकर उड़ गए। जब ब्राह्मण ने यह बात बताई तो दमयंती समझ गई कि वे राजा नल ही हैं।
इसलिए रानी ने फिर से रचाया स्वयंवर..
ब्राह्मण की बात सुनकर दमयंती की आंखों में आंसु भर आए। उसने अपनी माता को सारी बात बताई। तब उन्होंने कहा आप यह बात अब अपने पिताजी से ना कहे। मैं सुदैव ब्राह्मण को इस काम के लिए नियुक्त करती हूं। तब दमयंती ने सुदेव से कहा- ब्राह्मण देवता आप जल्दी से जल्दी अयोध्या नगरी पहुंचे। राजा ऋतुपर्ण से यह बात कहिए कि दमयंती ने फिर से स्वेच्छानुसार पति का चुनाव करना चाहती है।
बड़े-बड़े राजा और राजकुमार जा रहे हैं। स्वयंवर की तिथि कल ही है। इसलिए यदि आप पहुंच सकें तो वहां जाइए। नल के जीने अथवा मरने का किसी को पता नहीं है, इसलिए वह इसीलिए कल वे सूर्योदय पूर्व ही पति वरण करेंगी। दमयंती की बात सुनकर सुदेव अयोध्या गए और उन्होंने राजा ऋतुपर्ण से सब बातें कह दी। सुदेव की बातें सुनाकर बाहुक को बुलाया और कहा बाहुक कल दमयंती का स्वयंवर है और हमें जल्दी से जल्दी वहां पहुंचना है। यदि तुम मुझे जल्दी वहां पहुंच जाना संभव समझो तभी मैं वहां जाऊंगा।
ऋतुपर्ण की बात सुनकर नल का कलेजा फटने लगा। सोचा कि दमयंती ने दुखी और अचेत होकर ही ऐसा किया होगा। संभव है वह ऐसा करना चाहती हो। नल ने शीघ्रगामी रथ में चार श्रेष्ठ घोड़े जोत लिए। राजा ऋतुपर्ण रथ पर सवार हो गए। रास्ते में ऋतुपर्ण ने उसे पासें पर वशीकरण की विद्या सिखाई क्योंकि उसे घोड़ों की विद्या सीखने का लालच था। जिस समय राजा नल ने यह विद्या सीखी उसी समय कलियुग राजा नल के शरीर से बाहर आ गया।
रानी ने राजा को पहचानने के लिए क्या किया?
कलियुग ने नल का पीछा छोड़ दिया था। लेकिन अभी उनका रूप नहीं बदला था। उन्होंने अपने रथ को जोर से हांका और शाम होते-होते वे विदर्भ देश में पहुंचे। राजा भीमक के पास समाचार भेजा गया। उन्होंने ऋतुपर्ण को अपने यहां बुला लिया ऋतुपर्ण के रथ की गुंज से दिशाएं गुंज उठी। दमयंती रथ की घरघराहट से समझ गई कि जरूर इसको हांकने वाले मेरे पति देव हैं। यदि आज वे मेरे पास नहीं आएंगे तो मैं आग में कुद जाऊंगी।
उसके बाद अयोध्या नरेश ऋतुपर्ण जब राजा भीमक के दरबार में पहुंचे तो उनका बहुत आदर सत्कार हुआ। भीमक को इस बात का बिल्कुल पता नहीं था कि वे स्वयंवर का निमंत्रण पाकर यहां आए हैं। जब ऋतुपर्ण ने स्वयंवर की कोई तैयारी नहीं देखी तो उन्होंने स्वयंवर की बात दबा दी और कहा मैं तो सिर्फ आपको प्रणाम करने चला आया। भीमक सोचने लगे कि सौ-योजन से अधिक दूर कोई प्रणाम कहने तो नहीं आ सकता। लेकिन वे यह सोच छोड़कर भीमक के सत्कार में लग गए। बाहुक वाष्र्णेय के साथ अश्वशाला में ठहरकर घोड़ो की सेवा में लग गया। दमयंती आकुल हो गई कि रथ कि ध्वनि तो सुनाई दे रही है पर कहीं भी मेरे पति के दर्शन नहीं हो रहे। हो ना हो वाष्र्णेय ने उनसे रथ विद्या सीख ली होगी। तब उसने अपनी दासी से कहा हे दासी तु जा और इस बात का पता लगा कि यह कुरूप पुरुष कौन है? संभव है कि यही हमारे पतिदेव हों। मैंने ब्राह्मणों द्वारा जो संदेश भेजा था। वही उसे बतलाना और उसका उत्तर मुझसे कहना। तब दासी ने बाहुक से जाकर पूछा राजा नल कहा है क्या तुम उन्हें जानते हो या तुम्हारा सारथि वाष्र्णेय जानता है? बाहुक ने कहा मुझे उसके संबंध में कुछ भी मालुम नहीं है सिर्फ इतना ही पता है कि इस समय नल का रूप बदल गया है। वे छिपकर रहते हैं। उन्हें या तो दमयंती या स्वयं वे ही पहचान सकते हैं या उनकी पत्नी दमयंती क्योंकि वे अपने गुप्त चिन्हों को दूसरों के सामने प्रकट नहीं करना चाहते हैं।
इस तरह हुआ अमर प्रेम कहानी का सुखद अंत
अब दमयंती की आशंका और बढ़ गई और दृढ़ होने लगी कि यही राजा नल है। उसने दासी से कहा तुम फिर बाहुक के पास जाओ और उसके पास बिना कुछ बोले खड़ी रहो। उसकी चेष्टाओं पर ध्यान दो। अब आग मांगे तो मत देना जल मांगे तो देर कर देना। उसका एक-एक चरित्र मुझे आकर बताओ।
फिर वह मनुष्यों और देवताओं से उसमें बहुत से चरित्र देखकर वह दमयंती के पास आई और बोली बाहुक ने हर तरह से अग्रि, जल व थल पर विजय प्राप्त कर ली है। मैंने आज तक ऐसा पुरुष नहीं देखा। तब दमयंती को विश्वास हो जाता है कि वह बाहुक ही राजा नल है।
अब दमयंती ने सारी बात अपनी माता को बताकर कहा कि अब मैं स्वयं उस बाहुक की परीक्षा लेना चाहती हूं। इसलिए आप बाहुक को मेरे महल में आने की आज्ञा दीजिए। आपकी इच्छा हो तो पिताजी को बता दीजिए। रानी ने अपने पति भीमक से अनुमति ली और बाहुक को रानीवास बुलवाने की आज्ञा दी। दमयंती ने बाहुक के सामने फिर सारी बात दोहराई। तब दमयंती के आखों से आंसू टपकते देखकर नल से रहा नहीं गया। नल ने कहा मैंने तुम्हे जानबुझकर नहीं छोड़ा। नहीं जूआ खेला यह सब कलियुग की करतूत है। दमयंती ने कहा कि मैं आपके चरणों को स्पर्श करके कहती हूं कि मैंने कभी मन से पर पुरुष का चिंतन नहीं किया हो तो मेरे प्राणों का नाश हो जाए।
ऐसा अद्भुत दृश्य देखकर राजा नल ने अपना संदेह छोड़ दिया और कार्कोटक नाग के दिए वस्त्र को अपने ऊपर ओढ़कर उसका स्मरण करके वे फिर असली रूप में आ गए। दोनों ने सबका आर्शीवाद लिया दमयंती के मायके से उन्हें खुब धन देकर विदा किया गया। उसके बाद नल व दमयंती अपने राज्य में पहुंचे। राजा नल ने पुष्कर से फिर जूआं खेलने को कहा तो वह खुशी-खुशी तैयार हो गया और नल ने जूए की हर बाजी को जीत लिया। इस तरह नल व दमयंती को फिर से अपना राज्य व धन प्राप्त हो गया।
Webdunia
विदर्भ देश के राजा भीम की पुत्री दमयंती और निषध के राजा वीरसेन के पुत्र नल दोनों ही अति सुंदर थे। दोनों ही एक-दूसरे की प्रशंसा सुनकर बिना देखे ही एक-दूसरे से प्रेम करने लगे थे। दमयंती के स्वयंवर का आयोजन हुआ तो इन्द्र, वरुण, अग्नि तथा यम भी उसे प्राप्त करने के इच्छुक हो गए। वे चारों भी स्वयंवर में नल का ही रूप धारण आए। नल के समान रूप वाले 5 पुरुषों को देख दमयंती घबरा गई लेकिन उसके प्रेम में इतनी आस्था थी कि उसने देवाताओं से शक्ति मांगकर राजा नल को पहचान लिया और दोनों का विवाह हो गया।
नल-दमयंती का मिलन तो होता है, पर कुछ समय बाद वियोग भी हो जाता है। दोनों बिछुड़ जाते हैं। नल अपने भाई पुष्कर से जुए में अपना सब कुछ हार जाता है और दोनों बिछुड़ जाते हैं। दमयंती किसी राजघराने में शरण लेती है तथा बाद में अपने परिवार में पहुंच जाती है। उसके पिता नल को ढूंढने के बहाने दमयंती के स्वयंवर की घोषणा करते हैं।
दमयंती से बिछुड़ने के बाद नल को कर्कोटक नामक सांप डस लेता है जिस कारण उसका रंग काला पड़ गया था और उसे कोई पहचान नहीं सकता था। वह बाहुक नाम से सारथी बनकर विदर्भ पहुंचा। अपने प्रेम को पहचानना दमयंती के लिए मुश्किल न था। उसने अपने नल को पहचान लिया। पुष्कर से पुन: जुआ खेलकर नल ने अपनी हारी हुई बाजी जीत ली।
दमयंती न केवल रूपसी युवती थी बल्कि जिससे प्रेम किया, उसे ही पाने की प्रबल जिजीविषा लिए थी। उसे देवताओं का रूप-वैभव भी विचलित न कर सका, न ही पति का विरूप हुआ चेहरा उसके प्यार को कम कर
दमयंती
नल का अपने पूर्व रूप में प्रकट होकर दमयंती से मिलना
दमयंती विदर्भ देश के राजा भीमसेन की पुत्री थी। उसका विवाह निषध देश के राजा वीरसेन के पुत्र नल के साथ सम्पन्न हुआ था। दमयन्ती और नल दोनों ही अत्यंत सुन्दर थे। यद्यपि दोनों ने एक-दूसरे को देखा नहीं था, फिर भी एक-दूसरे की प्रशंसा सुनकर और बिना देखे ही एक-दूसरे से प्रेम करने लगे थे।
नल से प्रेम
हिन्दुओं के प्रसिद्ध और विश्व के सबसे बड़े महाकाव्य महाभारत में विदर्भ देश के राजा भीमसेन का उल्लेख है, जिसकी राजधानी 'कुण्डिनपुर' में थी। इसकी पुत्री दमयंती निषध नरेश नल की महारानी थी।[1] राजा भीमसेन की पुत्री दमयंती और वीरसेन के पुत्र नल दोनों ही अति सुंदर थे। दोनों ही एक दूसरे की प्रशंसा सुनकर बिना देखे ही एक-दूसरे से प्रेम करने लगे थे। जब दमयंती के पिता ने उसके स्वयंवर का आयोजन किया तो इसमें सम्मिलित होने के लिए इन्द्र, वरुण, अग्नि तथा यम भी आये और दमयंती को प्राप्त करने के इच्छुक हो गए। वे चारों भी स्वयंवर में नल का ही रूप धारण आए थे। नल के समान रूप वाले पांच पुरुषों को देखकर दमयंती घबरा गई, लेकिन उसके प्रेम में इतनी आस्था थी कि उसने देवताओं से शक्ति माँगकर राजा नल को पहचान लिया। इस प्रकार दोनों का विवाह सम्पन्न हुआ।
टीका टिप्पणी और संदर्भ
ततो विदर्भान् संप्राप्तं सायाह्ने सत्यविक्रमम्, ॠतुपर्णं जना राज्ञेभीमाय प्रत्यवेदयन्-वनपर्व 73,1
राजा नल!
हिंदू पौराणिक कथाओं में दर्ज एक ऐसा चरित्र, जो राजकुमारी दमयंती के बिना अधूरा है. जहां राजा नल अपनी वीरता, उदारता और पाक कौशल के लिए जाने जाते हैं, वहीं राजकुमारी दमयंती अपनी सौदर्यता के लिए. कहते हैं वह इतनी ज्यादा सुंदर थीं कि देवता भी उनसे शादी करना चाहते थे.
दोनों का जिक्र महाभारत में भी मिलता है. मान्यता है कि जब धर्मराज युधिष्ठिर को जुए में अपना सब-कुछ हार कर अपने भाईयों के साथ वनवास काट रहे थे, तब एक ऋषि ने उन्हें नल और दमयंती की ही कथा सुनाई थी. वह इसलिए क्योंकि उनकी तरह नल भी 'जुआ' खेलने के शौकीन थे!
खैर, आज कहानी नल-दमयंती के उस रिश्ते की, जिसके लिए वह आज भी लोककथाओं में जीवित हैं-
बिन मिले ही दे बैठे थे एक-दूजे को दिल!
नल-दमयंती की कहानी शुरु होती है निषध से. नल यहां के राजा हुआ करते थे. तमाम गुणों के होने के बावजूद वह शादी के बंधन में नहीं बंधे थे. इस दौरान उनके कानों तक विदर्भ नरेश की पुत्री दमयन्ती का नाम पहुंचा. चारों तरफ उनके यौवन और सुंदरता के चर्चे थे. दूसरी तरफ विदर्भ में राजा नल के गुणों के किस्से आम थे. ऐसे में दोनों के मन में पारस्परिक आकर्षण लाजमी था. किन्तु, समस्या यह थी कि आखिर दोनों मिले कैसे!
प्रचलित कथा की माने तो इसी सवाल के जवाब में एक दिन राजा नल अपने बगीचे में टहल रहे थे. तभी अचानक उन्हें एक हंस अच्छा लगा और उन्होंने उसे पकड़ लिया. हंस ने नल से निवेदन किया कि वह उसे छोड़ दें. इसके बदले वह राजकुमारी दमयंती के पास जाकर उनके गुणों का बखान करेगा. इससे दमयंती को पाने में उन्हें मदद मिल सकती है.
चूंकि, बात दमयंती तक अपने प्रेम संदेश को पहुंचाने की थी, इसलिए नल तुरंत मान गए. आगे उन्होंने बिल्कुल ऐसा ही किया. विदर्भ पहुंचने पर उन्होंने दमयंती को राजा नल के बारे में बताया. साथ ही उनका दिल खोलकर दमयंती के सामने रख दिया.
यह सुनकर दमयंती राजा नल के बारे में सोचने लगी. कहते हैं कि नल के लिए उनके अंदर आसक्ति इतनी बढ़ गयी थी कि वह रात-दिन उनका ही ध्यान करती रहती. इससे उनका स्वास्थ्य लगातार गिरता चला जा रहा था. यह देखकर उनके पिता चिंतित हुए. चिकित्सकों से सलाह मशवरा करने के उन्होंने तय किया कि वह अपनी बेटी दमयंती की शादी करेंगे!
जल्द ही दमयंती के पिता ने उनके लिए एक स्वयंवर का आयोजन किया. इसमें आज-पास के सभी राजाओं को बुलावा भेजा गया.
कहते हैं यह आमंत्रण पाकर देवराज इंद्र भी विदर्भ के लिए रवाना हो गए थे. यही नहीं उन्होंने राजा नल से कहा था कि वह उनके दूत बनकर दमयंती के पास जाए, और कहें कि वह उनसे विवाह कर लें. बहरहाल, अपना दिल दमयंती पर पहले ही हार चुके राजा नल कहां मानने वाले थे.
उन्होंने इंद्र से कहा भगवन् यह संभव नहीं है. मैं पहले ही दमयंती को अपनी पत्नी मान चुका हूं!
इस तरह आखिरकार वह दमयंती के स्वयंवर में जा ही पहुंचे. किन्तु परेशानी यहीं खत्म नहीं हुई थी. जैसे ही वह सभागार में पहुंचे, उन्होंने देखा कि कई सारे लोग उनका रूप धारण कर खड़े हुए हैं. ये लोग कोई और नहीं इंद्र के साथ दूसरे देवता गण थे. ऐसे में असली नल को पहचानना आसान नहीं था.
पर कहते हैं न कि प्यार की डगर में ऐसी परेशानियों की उम्र ज्यादा लंबी नहीं होती. दमयंती बिल्कुल भी परेशान नहीं हुईं. उन्होंने असली नल को पहचान लिया. साथ ही उन्हें अपना जीवनसाथी चुना. अगली कड़ी में दमयंती निषध पहुंचती हैं और नल के साथ सुखमय वैवाहिक जीवन शुरु करती हैं.
खैर, वक्त कैसा भी हो, अच्छा हो या बुरा वक्त का काम होता है बदल जाना, इसलिए वह बदल ही जाता है. दमयंती और नल के जीवन में भी वक्त ने अपनी करवट ली. ऐसी करवट, जिससे दोनों की जिंदगी बेपटरी हो गई!
तमाम गुणों के बावजूद राजा नल के अंदर के 'जुआ' खेलने जैसा बड़ा दुर्गुण भी था. इसी के चलते एक बार वह अपने भाई पुष्कर के साथ इसका आनंद लेने के लिए पहुंच गए. इसी क्रम में एक पल ऐसा आया, जब वह अपना सोना, चाँदी, रथ, राजपाट सब हार चुके थे.
नतीजा यह रहा कि उन्हें अपने राज्य से बाहर जाना पड़ा. ऐसे में दमयंती उनकी हमराही बनीं. उनकी स्थिति दयनीय थी. वह यहां-वहां अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे. इस बीच एक दिन नल की नजर सोने के पंख वाले पक्षी पर पड़ी. उन्हें देखते ही उनके मन में ख्याल आया कि अगर वह इनको पकड़ लेते हैं, तो आगे की राह आसान हो सकती है. हालांकि, वह इसमें सफल नहीं हो सके.
आगे हालात और ज्यादा बिगड़ते चले गए. नल खुद के लिए ज्यादा परेशान नहीं थे. उन्हें दमयंती की चिंता खाए जा रही थी. इसके हल के लिए उन्होंने तय किया कि वह दमयंती को अकेला छोड़कर चले जाएंगे. ऐसी स्थिति में शायद दमयंती अपने पिता के घर लौट जाएं. आगे उन्होंने ऐसा ही किया. एक दिन वह दमयंती को अकेला सोता हुआ छोड़ चले गए. जब दमयंती की आंखें खुलीं, तो वह विलाप करने लगीं.
उन्होंने राजा नल को यहां-वहां बहुत ढ़ूढ़ा, मगर वह नहीं मिले.
अंतत: उन्होंने खुद को अजगर का आहार बनाने की कोशिश की, तभी वहां से गुजर रहे एक व्याध ने उनकी रक्षा की. हालांकि, अगले ही पल वह उनके यौवन को देकर काम भावना से भर उठा. इसके तहत उसने जबरन उन्हें पाने की कोशिश की. ऐसे में दमयंती ने उन्हें शाप देखकर मृत्युदंड दे दिया.
आगे की कहानी में वह अपने पिता के पास पहुंचने में सफल रहीं. साथ ही अपने प्रभाव से राजा नल के सभी दुःखो का अंत करने में सफल रहीं.
दोनों के प्यार ने उन्हें फिर से मिलाया और उनकी प्रेम कहानी अमर हो गई
नल-दमयंती कथा
विदर्भ देश में भीष्मक नाम के एक राजा राज्य करते थे। उनकी पुत्री का नाम दमयन्ती थी। दमयन्ती लक्ष्मी के समान रूपवती थी। उन्हीं दिनों निषध देश में वीरसेन के पुत्र नल राज्य करते थे। वे बड़े ही गुणवान्, सत्यवादी तथा ब्राह्मण भक्त थे। निषध देश से जो लोग विदर्भ देश में आते थे, वे महाराज नल के गुणों की प्रशंसा करते थे। यह प्रशंसा दमयन्ती के कानों तक भी पहुँची थी। इसी तरह विदर्भ देश से आने वाले लोग राजकुमारी के रूप और गुणों की चर्चा महाराज नल के समक्षकरते। इसका परिणाम यह हुआ कि नल और दमयन्ती एक-दूसरे के प्रति आकृष्ण होते गये।
दमयन्ती का स्वयंवर हुआ। जिसमें न केवल धरती के राजा, बल्कि देवता भी आ गए। नल भी स्वयंवर में जा रहा था। देवताओं ने उसे रोककर कहा कि वो स्वयंवर में न जाए। उन्हें यह बात पहले से पता थी कि दमयंती नल को ही चुनेगी। सभी देवताओं ने भी नल का रूप धर लिया। स्वयंवर में एक साथ कई नल खड़े थे। सभी परेशान थे कि असली नल कौन होगा। लेकिन दमयंती जरा भी विचलित नहीं हुई, उसने आंखों से ही असली नल को पहचान लिया। सारे देवताओं ने भी उनका अभिवादन किया। इस तरह आंखों में झलकते भावों से ही दमयंती ने असली नल को पहचानकर अपना जीवनसाथी चुन लिया। नव-दम्पत्ति को देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त हु्आ। दमयन्ती निषध-नरेश राजा नल की महारानी बनी। दोनों बड़े सुख से समय बिताने लगे। दमयन्ती पतिव्रताओं में शिरोमणि थी। अभिमान तो उसे कभी छू भी न सकता था। समयानुसार दमयन्ती के गर्भ से एक पुत्र और एक कन्या का जन्म हुआ। दोनों बच्चे माता-पिता के अनुरूप ही सुन्दर रूप और गुणसे सम्पन्न थे समय सदा एक-सा नहीं रहता, दुःख-सुख का चक्र निरन्तर चलता ही रहता है। वैसे तो महाराज नल गुणवान्, धर्मात्मा तथा पुण्यस्लोक थे, किन्तु उनमें एक दोष था।—जुए का व्यसन। नल के एक भाई का नाम पुष्कर था। वह नल से अलग रहता था। उसने उन्हें जुए के लिए आमन्त्रित किया। खेल आरम्भ हुआ। भाग्य प्रतिकूल था। नल हारने लगे, सोना, चाँदी, रथ, राजपाट सब हाथ से निकल गया। महारानी दमयन्ती ने प्रतिकूल समय जानकर अपने दोनों बच्चों को विदर्भ देशकी राजधानी कुण्डिनपुर भेज दिया।
इधर नल जुए में अपना सर्वस्व हार गये।। उन्होंने अपने शरीर के सारे वस्त्राभूषण उतार दिये। केवल एक वस्त्र पहनकर नगर से बाहर निकले। दमयन्ती ने भी मात्र एक साड़ी में पति का अनुसरण किया। एक दिन राजा नल ने सोने के पंख वाले कुछ पक्षी देखे। राजा नल ने सोचा, यदि इन्हें पकड़ लिया जाय तो इनको बेचकर निर्वाह करने के लिए कुछ धन कमाया जा सकता है। ऐसा विचारकर उन्होंने अपने पहनने का वस्त्र खोलकर पक्षियों पर फेंका। पक्षी वह वस्त्र लेकर उड़ गये। अब राजा नल के पास तन ढकने के लिए भी कोई वस्त्र न रह गया। नल अपनी अपेक्षा दमयन्ती के दुःख से अधिक व्याकुल थे। एक दिन दोनों जंगल में एक वृक्ष के नीचे एक ही वस्त्र से तन छिपाये पड़े थे। दमयन्ती को थकावट के कारण नींद आ गयी। राजा नल ने सोचा, दमयन्ती को मेरे कारण बड़ा दुःख सहन करना पड़ रहा है। यदि मैं इसे इसी अवस्था में यहीं छोड़कर चल दूँ तो यह किसी तरह अपने पिताके पास पहुँच जायगी।
यह विचारकर उन्होंने तलवार से उसकी आधी साड़ी को काट लिया और उसी से अपना तन ढककर तथा दमयन्ती को उसी अवस्था में छोड़ कर वे चल दिये। जब दमयन्ती की नींद टूटी तो बेचारी अपने को अकेला पाकर करुण विलाप करने लगी। भूख और प्यास से व्याकुल होकर वह अचानक अजगर के पास चली गयी और अजगर उसे निगलने लगा। दमयन्ती की चीख सुनकर एक व्याध ने उसे अजगर का ग्रास होने से बचाया। किंतु व्याध स्वभाव से दुष्ट था। उसने दमयन्ती के सौन्दर्य पर मुग्ध होकर उसे अपनी काम-पिपासा का शिकार बनाना चाहा। दमयन्ती उसे शाप देते हुए बोली—‘यदि मैंने अपने पति राजा नल को छोड़कर किसी अन्य पुरुष का चिन्तन किया हो तो इस पापी व्याध के जीवन का अभी अन्त हो जाय।’ दमयन्ती की बात पूरी होते ही व्याध के प्राण-पखेरू उड़ गये। दैवयोग से भटकते हुए दमयन्ती एक दिन चेदिनरेश सुबाहु के पास और उसके बाद अपने पिता के पास पहुँच गयी। अंततः दमयन्ती के सतीत्व के प्रभाव से एक दिन महाराज नल के दुःखो का भी अन्त हुआ। दोनों का पुनर्मिलन हुआ और राजा नल को उनका राज्य भी वापस मिल गया
नल दमयंती की प्रेम कहानी से जानें क्या होता है पत्नी धर्म
निषध देश में वीरसेन के पुत्र नल नाम के एक राजा थे. बहुत सुन्दर और गुणवान थे. वे सभी तरह की अस्त्र विद्या में भी बहुत निपुण थे. उन्हें जुआ खेलने का थोड़ा शौक था. एक दिन राजा नल ने देखा कि बहुत से पक्षी उनके पास ही बैठे है.
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प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर
रोहित
नई दिल्ली,
06 जनवरी 2018,
अपडेटेड 2:06 PM IST
हर शादीशुदा व्यक्ति की अपनी पत्नी से कुछ अपेक्षाएं होती हैं. ठीक उसी तरह जिस तरह हर एक पत्नी की अपने पति से कुछ अपेक्षा होती है. लेकिन बदलते दौर में देखा गया है कि हम अपनी चीजें एक दूसरे पर थोपने लगे हैं. रिश्ते की डोर को इतना कमजोर कर दिया है कि हल्की-फुल्की बात पर भी लोग अलग होने का फैसला लेने में संकोच नहीं करते. आइए नल दमयंती की प्रेम कहानी से जानते हैं क्या होता है पत्नी धर्म.
निषध देश में वीरसेन के पुत्र नल नाम के एक राजा थे. बहुत सुन्दर और गुणवान थे. वे सभी तरह की अस्त्र विद्या में भी बहुत निपुण थे. उन्हें जुआ खेलने का थोड़ा शौक था.
जानें, गणेश भगवान की किस रंग की मूर्ति हरेगी आपके कष्ट
राजा का वस्त्र लेकर उड़े पक्षी
एक दिन राजा नल ने देखा कि बहुत से पक्षी उनके पास बैठे हैं. जिनके पंख सोने के समान दमक रहे हैं. नल ने सोचा कि इनके पंख से कुछ धन मिलेगा. ऐसा सोचकर उन्हें पकड़ने के लिए नल ने उनपर अपना पहनने का वस्त्र डाल दिया. इससे पहले कि वह पक्षियों को पकड़ पाते वे उनका वस्त्र लेकर उड़ गए. अब नल नग्न होकर बड़ी दीनता के साथ मुंह नीचे करके खड़े हो गए.
कभी ना करें मां का अपमान, नहीं तो भोगने होंगे ये कष्ट
नल ने दमयन्ती से कही पासे की बात
पक्षियों ने कहा, 'तू नगर से एक वस्त्र पहनकर निकला था. उसे देखकर हमें बड़ा दुख हुआ था. ले! अब हम तेरे शरीर का वस्त्र लिए जा रहे हैं. हम पक्षी नहीं जुए के पासे हैं.' नल ने दमयन्ती से पासे की बात कह दी. तुम देख रही हो, यहां बहुत से रास्ते है. एक अवन्ती की ओर जाता है. दूसरा पर्वत होकर दक्षिण देश को. सामने विन्ध्याचल पर्वत है. यह पयोष्णी नदी समुद्र में मिलती है. सामने का रास्ता विदर्भ देश को जाता है. यह कौशल देश का मार्ग है.
दमयंती ने राजा से कहा. 'मैं आपके साथ रहकर आपके दुख दूर करूंगी'
इस प्रकार राजा नल दुख और शोक से भरकर बड़ी ही सावधानी के साथ दमयन्ती को भिन्न-भिन्न आश्रम मार्ग बताने लगे. दमयन्ती की आंखें आंसू से भर गईं. दमयन्ती ने राजा नल से कहा क्या आपको लगता है कि मैं आपको छोड़कर अकेली कहीं जा सकती हूं. मैं आपके साथ रहकर आपके दुख को दूर करूंगी. यह सुनकर नल प्रसन्न हो गए और भाव-विह्वल होकर पत्नी को गले लगा लिया.
इस प्रकार संकट से समय में दमयंती ने राजा नल का साथ देकर उनके दुख को दूर कर दिया. दुख के अवसरों पर पत्नी पुरुष के लिए औषधि के समान है. वह धैर्य देकर पति के दुख को कम करती है. साथ देने मात्र से वह अपने पति के लक्ष्य को बेहद आसान कर सकती है.
नल-दमयंती की प्रेमकथा की जन्मस्थली है यह स्थान
महाभारत काल में नल-दमयंती की प्रेमकथा की जन्म स्थली नरवर ने कई ऐतिहासिक उतार-चढ़ाव देखे
ग्वालियर/शिवपुरी। नर यानि मनुष्य तथा वर माने श्रेष्ठ। नरवर का शाब्दिक अर्थ हुआ श्रेष्ठ मनुष्य। महाभारत काल में नल-दमयंती की प्रेमकथा की जन्म स्थली नरवर ने कई ऐतिहासिक उतार-चढ़ाव देखे। निषध देश में वीरसेन के पुत्र नल नाम के राजा हो चुके हैं। विदर्भ देश के भीमक राजा की सुपुत्री दमयंती ने इंद्र,वरुण,अग्नि व यम जैसे देवताओं की उपेक्षा करके राजा नल को वरण किया था।
दमयंती द्वारा देवताओं की उपेक्षा से द्वापर व कलियुग नाराज हो गए तथा 12 वर्ष तक राजा नल में कोई दोष नहीं खोज पाए। इस बीच नल व दमयंती के पुत्र इंद्रसेन व पुत्री इंद्रसेना हुए। दंपती को दंडित करने के लिए द्वापर व कलयुग ने राजा नल के छोटे भाई पुष्कर को उकसाया कि वो नल से जुआ खेलें। जुएं में एक बार बैठने के बाद राजा नल पूरी संपत्ति के साथ ही राजपाठ, आभूषण व तन के वस्त्र तक हार गए।
पानी पीकर पड़े रहे नगर के द्वार पर
पुष्कर ने राजा नल से कहा कि अब तुम्हारे पास हारने को कुछ भी नहीं बचा, क्या अब तुम अपनी पत्नी को दांव पर लगाओगे। राजा को जुए में हारता देख दमयंती ने अपने बच्चों को सारथी वष्णेय के साथ कुंडिनगर अपने पिता के घर भेज दिया। जुए में सब कुछ हारकर राजा नल केवल एक वस्त्र में अपनी पत्नी के साथ नगर छोड़ कर बाहर आ गए। वह केवल पानी पीकर नगर के द्वार पर पड़े रहे।
पुष्कर के इस आदेश के बाद कि कोई भी राजा नल के साथ सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार नहीं करेगा, ऐसा करने वाले को मृत्यु दंड दिया जाएगा। कोई भी राजा नल को प्रणाम तक नहीं करता था। आखिर राजा नल व दमयंती वन में आ गए। जहां राजा नल ने स्वर्ण पंखों वाले पक्षियों को पकडऩे का प्रयास किया तो वे पक्षी राजा नल का इकलौता वस्त्र भी ले उड़े। हताश व निराश राजा नल ने अपना तन अपनी पत्नी की साड़ी के एक टुकड़े से ढंका तथा इसी निराशा में एक रात वो अपनी पत्नी को धर्मशाला में सोता हुआ छोड़कर चले गए।
रहने लगी दासी के रूप में
दमयंती ने अपने पति को खोजने का प्रयास किया, पर वे नहीं मिले। मुसीबत झेलती हुई रानी दमयंती चंदेरी पहुंचीं, जहां राजमहल में दासी के रूप में रहने लगीं। इधर, राजा नल जंगल में लगी आग से एक सर्प के प्राणों की रक्षा करते हैं। सर्प राजा को डंस कर उसके रूप को बदल देता है, साथ ही दो वस्त्र के साथ यह वरदान देता है कि जब तुम्हें अपने रूप परिवर्तन की आवश्यकता होगी, तो मुझे स्मरण करके इन वस्त्रों को पहन लेना, तुम्हारा पहले जैसा रूप हो जाएगा।
मेरे प्यारे छलिया तुम मेरी साड़ी में...
दमयंती के पिता भीमक ने अपने दामाद व बेटी को ढूंढने के लिए ब्राह्मण भेजे, जिसमें दमयंती तो मिल गई, लेकिन राजा नल का पता नहीं चला। रानी दमयंती ने ब्राह्मणों से कहा कि हर स्थान पर जाकर यह कहना कि मेरे प्यारे छलिया तुम मेरी साड़ी में से आधी फाड़ कर तथा मुझ दासी को सोती छोड़कर कहां चले गए, तुम्हारी वह दासी उसी अवस्था में तुम्हारी वाट जोह रही है। अयोध्या से लौटे एक ब्राह्मण ने बताया कि अयोध्या राजा के दरबार में जब मैंने यह संदेश दिया तो एक कुरूप व्यक्ति रोने लगा।
बच्चों को देख भर आया पिता का हृदय
रानी दमयंती, राजा नल के तीव्र रथ संचालन की कला के बारे में जानती थी। उसने अपनी मां की सहमति से अयोध्या के राजा ऋतुपर्ण को दमयंती के पुन: विवाह के लिए स्वयंवर का संदेश पहुंचाया और कहा कि स्वयंवर कल ही है। अयोध्या के राजा जिस रथ से आए,उसके सारथी के पास दमयंती ने अपनी सेविका केशनी को भेजा और परखने का प्रयास किया। अंत में उसने अपने दोनों बच्चों को भी सारथी के पास भेज दिया।
जिन्हें देखकर एक पिता का हृदय भर आया और उसने अपने बच्चों को गले से लगा लिया। दमयंती अपने पति के पास जा पहुंची। राजा नल ने भी अपना रूप बदलकर दमयंती को पूर्ववत पत्नी का स्नेह दिया। ऋतुपर्ण की सीखी पाशों की विद्या से राजा नल ने पुन: राजपाठ व वैभव प्राप्त कर लिया। राजा नल के नाम पर ही इस नगर का नाम पहले नलपुर और बाद में बिगड़कर नरवर हो गया।
नल-दमयन्ती विवाह महाभारत वनपर्व के नलोपाख्यानपर्व के अंतर्गत अध्याय 57 में स्वयंवर में दमयन्ती द्वारा नल का वरण कर लेना, देवताओं का नल को वर देना, देवताओं और राजाओं का प्रस्थान, नल-दमयन्ती का विवाह एवं नल का यज्ञानुष्ठान और संतानोत्पादन के बारे में बताया गया है। जिसका उल्लेख निम्न प्रकार है[1]- नल का दमयन्ती से वार्तालाप करना कि मैं स्वयंवर में उन देवताओं के समीप ही आपका वरण कर लूंगी। महाबाहो! ऐसा होने पर आपको दोष नहीं लगेगा’। नल द्वारा देवताओं को दमयन्ती का संदेश सुनाने के पश्चात् की कथा इस प्रकार है- बृहदश्व मुनि कहते हैं- राजन! तदनन्तर शुभ समय, उत्तम तिथि तथा पुण्यदायक अवसर आने पर राजा भीम ने समस्त भूपालों को स्वयंवर के लिये बुलाया। यह सुनकर सब भूपाल कामपीड़ित हो दमयन्ती को पाने की इच्छा से तुरन्त चल दिये। रंगमण्डप सोने के खम्भों से सुशोभित था। तोरण से उसकी शोभा और बढ़ गयी थी। जैसे-जैसे बडे़-बड़े सिंह पर्वत की गुफा में प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार उन नरेशों ने रंगमण्डप में प्रवेश किया। वहाँ सब भूपाल भिन्न-भिन्न आसनों पर बैठ गये। सबने सुगन्धित फूलों की माला धारण कर रक्खी थी और सबके कानों में विशुद्ध मणिमय कुण्डल झिलमिला रहे थे। व्याघ्रों से भरी हुई पर्वत गुफा तथा नागों से सुशोभित भोगवती पुरी की भाँति वह पुण्यमयी राजसभा नरश्रेष्ठ भूपालों भरी दिखायी देती थी। वहाँ भूमिपालों की (पांच अंगुलियों से युक्त) परिघ-जैसी मोटी भुजाएं आकार-प्रकार और रंग में अत्यन्त सुन्दर तथा पांच मस्तक वाले सर्प के समान दिखायी देती थीं। जैसे आकाश में तारे प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार सुन्दर केशांत भाग से विभूषित एवं रुचिर नासिका, नेत्र और भौहों से युक्त राजाओं के मनोहर सुख सुशोभित हो रहे थे। तदनन्तर अपनी प्रभा से राजाओं के नयनों को लुभाती और चित्त को चुराती हुई सुन्दर मुखवाली दमयन्ती ने रंगभूमि में प्रवेश किया। वहाँ आते ही दमयन्ती के अंगों पर उस महामना नरेशों की दृष्टि पड़ी। उसे देखने वाले राजाओं में से जिसकी दृष्टि दमयन्ती के जिस अंग पर पड़ी, वही लग गयी, वहाँ से हट न सकी। भारत! तत्पश्चात् राजाओं के नाम, रूप, यश और पराक्रम आदि का परिचय दिया जाने लगा। भीमकुमारी दमयन्ती ने आगे बढ़कर देखा, यहाँ तो एक जगत पांच पुरुष एक ही आकृति के बैठे हुए हैं। उन सबके रूप-रंग आदि में कोई अन्तर नहीं था। वे पांचों नल के ही समान दिखायी देते थे। उन्हें एक जगह स्थित देखकर संदेह उत्पन्न हो जाने से विदर्भराजकुमारी वास्तविक राजा नल को पहचान न सकी। वह उनमें से जिस-जिस व्यक्ति पर दृष्टि डालती, उसी-उसी को राजा नल समझने लगती थी। वह भाविनी राजकन्या बुद्धि से सोच-विचारकर मन-ही-मन तर्क करने लगी। अहो! मैं कैसे देवताओं को जानूं और किस प्रकार राजा नल को पहचानू।’ इस चिंता में पड़कर विदर्भराजकुमारी दमयन्ती को बड़ा दुःख हुआ। भारत! उसने अपने सुने हुए देवचिह्नों पर भी विचार किया। वह मन-ही-मन कहने लगी, मैंने बडे़-बुढे़ पुरुषों से देवताओं की पहचान कराने वाले जो लक्षण या चिह्र सुन रक्खे हैं, उन्हें यहाँ भूमि पर बैठे हुए इन पांच पुरुषों में से किसी एक में भी नहीं देख पाती हूँ।’ उसने अनेक प्रकार से निश्चय और बार-बार विचार करके देवताओं की शरण में जाना ही समयोचित कर्तव्य समझा। तत्पश्चात् मन एवं वाणीद्वारा देवताओं को नमस्कार करके दोनों हाथ जोड़कर कांपती हुई वह इस प्रकार बोली-‘मैंने हंसों की बात सुनकर निषधनरेश नल का पतिरूप में वरण कर लिया है। इस सत्य के प्रभाव से देवता पतिरूप में वरण कर लिया है। इस सत्य के प्रभाव से देवता लोग स्वयं ही मुझे राजा नल की पहचान करा दें। ‘यदि मैं मन, वाणी एवं क्रिया द्वारा कभी सदाचार से च्युत नहीं हुई हूँ तो उस सत्य के प्रभाव से देवता लोग मुझे राजा नल की प्राप्ति करावें। ‘यदि देवताओं ने उन निषध नरेश नल को ही मेरा पति निश्चित किया हो तो उस सत्य के प्रभाव से देवता लोग मुझे उन्हीं को बता दें। ‘यदि मैंने नल की आराधना के लिये ही यह व्रत आरम्भ किया हो तो उस सत्य के प्रभाव से देवता मुझे उन्हीं को बता दें। ‘महेश्वर लोकपालगण अपना रूट प्रकट कर दें, जिससे मैं पूण्यलोक महाराज नल को पहचान सकूं। दमयन्ती का वह करूण विलाप सुनकर तथा उसके अंतिम निश्चय, नल विषयक वास्वविक अनुराग, विशुद्ध हृदय, उत्तम बुद्धि तथा नल के प्रति भक्ति एवं प्रेम देखकर देवताओं ने दमयन्ती के भीतर वह यथार्थ शक्ति उत्पन्न कर दी, जिससे उसे देवसूचक लक्षणों का निश्चय हो सके। अब दमयन्ती ने देखा-सम्पूर्ण देवता स्वेदरहित हैं- उनके किसी अंग में पसीने की बूंद नहीं दिखायी देती, उनकी आंखों की पलके नहीं गिरती हैं। उन्होंने जो पुष्प मालाएं पहन रक्खी हैं, वे नूतन विकार से युक्त हैं। वे सिंहासनों पर बैठे हैं, किंतु अपने पैरों से पृथ्वीतल का स्पर्श नहीं करते हैं और उनकी परछाई नहीं पड़ती है। उन पांचों में एक पुरुष ऐसे हैं, जिसकी परछाई पड़ रही है। उनके गले की पुष्प माला कुम्हला गयी है। उनके अंगों में धूलकण और पसीने की बूंदे भी दिखायी पड़ती हैं। वे पृथ्वी का स्पर्श किये बैठे हैं और उनके नेत्रों की पलके गिरती हैं। इन लक्षणों से दमयन्ती ने निषधराज नल को पहचान लिया। भरतकुलभूषण पाण्डुनन्दन! राजकुमारी दमयन्ती ने उन देवताओं तथा पुण्यश्लोक नल की ओर पुनः दृष्टिपात करके धर्म के अनुसार विषधराज नल का ही वरण किया। विशाल नेत्रों वाली दमयन्ती ने लजाते-लजाते नल के वस्त्र का छोर पकड़ लिया और उनके गले में परम सुन्दर फूलों का हार डाल दिया। इस प्रकार वरवर्णिनी दमयन्ती ने राजा नल का पति रूप में वरण कर लिया। फिर तो दूसरे राजाओं के मुख में सहसा सहसा ‘हाहाकार’ का शब्द निकल पड़ा। भारत! देवता और महर्षि वंहा साधुवाद देने लगे। सबने विस्मित होकर राजा नल की प्रशंसा करते हुए इनके सौभाग्य को सहारा। कुरुनन्दन! वीरसेन कुमार नल ने उल्लसित हृदय से सुन्दरी दमयन्ती को आश्वासन देते हुए कहा- ‘कल्याणी! तुम देवताओं के समीप जो मुझ-जैसे पुरुष का वरण कर रही हो, इस अलौकिक अनुराग के कारण अपने इस पति को तुम सदा अपनी प्रत्येक आज्ञा के पालन में तत्पर समझो। ‘पवित्र मुसकानवाली देवि! मेरे इस शरीर में जब तक प्राण रहेंगे, तब तक तुम में मेरा अनन्य अनुराग बना रहेगा, यह मैं तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ। इसी प्रकार दमयन्ती ने भी हाथ जोड़कर विनीत वचनों द्वारा महाराज नल का अभिनन्दन किया। वे दोनों एक दूसरे को पाकर बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने सामने अग्नि आदि देवताओं को देखकर मन ही मन उनकी ही शरण ली। दमयन्ती ने जब नल को वरण कर लिया, तब उन सब महातेजस्वी लोकपालों ने प्रसन्नचित्त होकर नल को आठ वरदान दिये। शचीपति इन्द्र ने प्रसन्न होकर निषधराज नल को यह वर दिया कि[2]हविष्यभोक्ता अग्निेव नल को अपने ही समान तेजस्वी लोक प्रदान किये और यह भी कहा कि ‘राजा नल जहाँ चाहेंगे, वही मैं प्रकट हो जाऊंगा’। यमराज ने यह कहा कि ‘राजा नल की बनाई हुई रसोई में उत्तमात्तम एवं स्वाद उपलब्ध होगा और धर्म में इनकी दृढ़ निष्ठा बनी रहेगी’। जल के स्वामी वरुण ने नल की इच्छा के अनुसार जल प्रकट होने का वर दिया और यह भी कहा कि ‘तुम्हारी पुष्पमालाएं सदा उत्तम गन्ध से सम्पन्न होगी।’ इस प्रकार सब देवताओं ने दो-दो वर दिये। इस प्रकार राजा नल को वरदान देकर वे देवता लोग स्वर्गलोक को चले गये। स्वयंवर में आये हुए राजा भी विस्मयविमुग्ध हो नल और दमयन्ती के विवाहोत्सव का-सा अनुभव करते हुए प्रसन्नतापूर्वक जैसे आये थे, वैसे लौट गये। सब नरेशों के विदा हो जाने पर महात्मा भीम ने बड़ी प्रसन्नता के साथ नल-दमयन्ती का शास्त्रविधि से अनुसार विवाह कराया। मनुष्यों में श्रेष्ठ निषधनरेश नल अपनी इच्छा के अनुसार कुछ दिनों तक ससुराल में रहे, फिर विदर्भनरेश भीम की आज्ञा ले (दमयन्ती सहित) अपनी राजधानी को निकल चले गये। राजन! पुण्यश्लोक महाराज नल ने भी उस रमणीरत्न को पाकर उसके साथ उसी प्रकार विहार किया, जैसे शची के साथ इन्द्र करते हैं। राजा नल सूर्य के समान प्रकाशित होते थे। वीरवर नल अत्यन्त प्रसन्न कह कर अपनी प्रजा का धर्मपूर्वक पालन करते हुए उसे प्रसन्न रखते थे। उन बुद्धिमान नरेश ने बहुषनन्दन ययाति की भाँति अश्वमेध तथा पर्याप्त दक्षिणा वाले दूसरे बहुत-से यज्ञों का भी अनुष्ठान किया। तदनन्तर देवतुल्य राजा नल ने दमयन्ती के साथ रमणीय वनों और उपवनों में विहार किया। महामना नल ने दमयन्ती के गर्भ से इन्द्रसेन के नामक एक पुत्र और इन्द्रसेना नाम वाली एक कन्या को जन्म दिया। इस प्रकार यज्ञों का अनुष्ठान तथा सुखपूर्वक विहार करते हुए महाराज नल ने धन-धान्य सम्पन्न वसुन्धरा का पालन किया।[3]
निषध राजकुमार नल और विदर्भ राजकुमारी दमयंती के मिलन-परिणय की अद्भुत कथा है यह। रुदन, हास, मिलन, विछोह के मनके इस तरह संयुक्त हो उठे हैं इस कहानी में कि नल दमयंती मिलन की एक मनोहारी माला बन गयी है- अनोखी सुगंध से भरपूर। नल दमयंती की यह कथा नाट्य-रूप में संक्षिप्ततः प्रस्तुत है।
अरविन्द जी ने शिल्पा मेहता जी के एक विशिष्ट आग्रह को पूर्ण करते हुए कुछ दिनों पूर्व नल-दमयंती आख्यान सरलतः अपने ब्लॉग पर प्रकाशित किया। नल और दमयंती की प्रणय-परिणय कथा मुझे भी आकर्षित किए हुए थी, और इसे नाट्य-रुप में ढालने की उत्कंठा भी बहुत पुरानी थी। अरविन्द जी से आशीर्वाद ले इस आख्यान को नाट्यरूप में प्रस्तुत करने का सहज प्रयास है यह। वस्तुतः यह आख्यान नाट्य-रूप में काफी विस्तार की माँग करता है। कोशिश यह होगी कि आख्यान के मर्मस्पर्शी अंश निश्चिततः विस्तार लें, और शेष सूत्रतः इस आख्यान को आगे बढ़ायें। इस प्रस्तुति की प्रेरणा के लिए अरविन्द जी का आभार। यह प्रविष्टि इस रूप में बाबूजी के विशिष्ट योग से आ पायी है, मैं सदा नत्।
प्रथम दृश्य
(राजमहल का दृश्य। निषध नरेश नल विदर्भ राजकुमारी दमयंती के विवाह के लिए आयोजित स्वयंवर में जाने से पूर्व अपने कुलगुरु से आशीर्वाद के लिए प्रस्तुत होते हैं। कुलगुरु को प्रणाम करते हैं।)
कुलगुरु: कल्याण हो राजन्! हे प्रजापालक! जो राजा, गुरु एवं श्रेष्ठजनों को आदर-सम्मान करता है, समकक्षी राजाओं को यथोचित स्थान देता है और प्रजा को पुत्रवत स्नेह करता है, उसका राज सदा ही निष्कंटक और चिरस्थायी होता है।
नल: आशीष दें कुलगुरु! आपके आशीर्वचनों का अक्षरशः पालन कर सकूँ और मेरे मन मन्दिर में ले रही कल्पना की मूर्ति चिरस्थायी हो सके।
कुलगुरु: जाओ राजन्! तुम्हारा मनोरथ निश्चय ही पूर्ण होगा। स्वयंवर में उपस्थित राजा-राजकुमार तुम्हारे तेज से वैसे ही प्रतिहत हो जायेंगे जैसे कि सूर्य की तेजोमय रश्मियों से तारे। विजयी भवः राजन! विजयी भव:।
(नल प्रणाम करता है। पर्दा गिरता है।)
द्वितीय दृश्य
(पर्दा उठता है। इन्द्र, अग्नि, वरुण, यम राजा नल से मिलने जा रहे हैं)
इन्द्र: देव! हम पहुँच गए! मुझे निषध नरेश नल की ही प्रतीति हो रही है जो सकल लोक हृदयानन्द त्रिभुवन विलोचन है। रमणीयता को भी दुगुनी रमणीयता प्रदान करने वाले और नवयौवन सागर का अमृत रस स्वरूप हैं वह।
वरुण: हाँ देव! लग रहा है पुण्डरीकाक्ष नारायण ही, नल का रूप धारण कर लिए हैं। यह अमानुषी आकृति प्रणाम के योग्य है, यह भीम सुता को सनाथ करता हुआ प्रतीत हो रहा है।
अग्नि: सत्य ही वरुण देव! लगता है इस महीपति के हृदय में धर्म का, अनुग्रह में कुबेर का, नेत्र में लक्ष्मी का और वाणी में वीणावादिनी का सत्व रच बस गया है। बुद्धि में वृहस्पति, तेज में भाष्कर तथा सौन्दर्य में मनसिज की निवास भूमि होने से यह सर्वदेवमय प्रकटित नल रूप ही है जो दमयंती स्वयंवर को सुशोभित करेगा।
यम: हाँ, अग्निदेव! मुझे पूर्ण विदित है कि महाराज नल का राजभवन श्रेष्ठ मित्रों, राजपुरुषों से सदा सुशोभित रहता है। यज्ञ-यज्ञादि धर्म कार्य से सम्पूर्ण प्रजा सुयश और सम्मान का भाजन बनती है। अभ्यागतों का आदर सम्मान करने वाला यह महापुरुष अत्योत्तम है।
(देवताओं का आगमन। नल सबको प्रणाम करते हैं।)
यह प्रस्तुति
नल दमयंती की यह कहानी अद्भुत है। भारत वर्ष के अनोखे अतीत की पिटारी खोलने पर अमूल्य रत्नों की विशाल राशि विस्मित करती है। इस पिटारी में यह कथा-संयोग ऐसा ही राग का एक अनमोल चमकता मोती है। भाव-विभाव और संचारी भाव ऐसे नाच उठे हैं कि अद्भुत रस की निष्पत्ति हो गयी है। निषध राजकुमार नल और विदर्भ राजकुमारी दमयंती के मिलन-परिणय की अद्भुत कथा है यह। रुदन, हास, मिलन, विछोह के मनके इस तरह संयुक्त हो उठे हैं इस कहानी में कि नल दमयंती मिलन की एक मनोहारी माला बन गयी है- अनोखी सुगंध से भरपूर। नल दमयंती की यह कथा नाट्य-रूप में संक्षिप्ततः प्रस्तुत है। दृश्य-परिवर्तन के क्रम में कुछ घटनायें तीव्रता से घटित होती दिखेंगी (नेपथ्य में)। इसका कारण नाट्य के अत्यधिक विस्तृत हो जाने का भय है, और शायद मेरी लेखनी की सीमा भी। प्रस्तुत है पहली कड़ी।
वरुण: राजेन्द्र नल! आप बड़े सत्यव्रती हैं। हम लोग याचक होकर आपके पास आये हैं। आपसे अपने कार्य की सम्पन्नता के लिए आग्रह करते हैं। आप वचन दीजिए कि हमारा मनोरथ सिद्ध करेंगे।
नल: कोई भी याचना करे और नल उसे पूरा न करे, ऐसा कभी संभव नहीं हो सकता। मैं आपका कार्य अवश्य करूँगा, ऐसी प्रतिज्ञा करता हूँ। किन्तु पहले आप अपना परिचय देने की कृपा तो करें। आप लोग कौन हैं?
इन्द्र: महाराज नल! हम देवता हैं, मैं इन्द्र हूँ, ये अग्नि हैं, आप वरुण हैं और आप यम। आप हमारा दूत-कर्म कर दें। दमयंती के पास जाकर यह निवेदन कर दें कि इन्द्र, वरुण, अग्नि और यम देवता तुमसे परिणय करना चाहते हैं।
नल: (दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए) देवराज! जिस दमयंती का वरण करने मैं जा रहा हूँ उसी का दूतकर्म भला कैसे करूँगा? ऐसे सर्वज्ञ, विश्वपूज्य आप लोगों को मुझ तुच्छ को ठगने में क्या दया नहीं आयी? खेद है! बड़े लोगों को तो पहले, उचित है कि वे किसी को ठगने का विचार ही न करें और यदि करें भी तो उन्हें बड़े लोगों को ही ठगना चाहिए। मनुष्य होने से देवताओं की अपेक्षा अत्यन्त तुच्छ, मुझे ठगने में तो आप जैसे देवताओं को दया होनी चाहिए। ऐसा तुच्छ काम भला मैं क्यों करूँ? आपलोग कृपया इस विषय में मुझे क्षमा ही करें। मुझे दूत बनाकर वहाँ भेजने से आपलोगों का कार्य सिद्ध होना तो दूर रहा, पहले ही सबको विदित होने से बिगड़ जाएगा।
वरुण: नल! तुम क्षत्रिय हो और कदाचित तुम्हें स्मरण होगा कि क्षत्रिय वचन पालन हेतु प्राणोत्सर्ग करने में भी किंचित मात्र नहीं हिचकिचाते, अतः नल! अपने कुल और क्षत्रिय धर्म की रक्षा हेतु दिए गए वचन को पूर्ण करो और अविलम्ब प्रस्थान करो।
नल: दमयंती के लिए जिस प्रकार आपलोगों ने मुझसे याचना की है, उसी प्रकार मैं एक साधारण मानव होकर श्रेष्ठ देवाधिपति आपलोगों से भीम कुमारी दमयंती की याचना करता हूँ। कुण्डिल पुराधीश की कन्या ने तो पहले से ही मुझे वरण कर लिया है, ऐसा निश्चित है। अतः सहसा मुझे देखने पर वह सात्विक भावों के उदय होने से लज्जित हो जाएगी और निश्चय है कि आप लोगों का वरण नहीं करेगी। वह आपलोगों के वरण का प्रस्ताव भी नहीं सुनना चाहेगी। अतः उसके लिए आपलोगों की इच्छा करना व्यर्थ ही है। इस कारण आपलोग मेरे ऊपर प्रसन्न हों क्योंकि यह मेरे लिए अत्यन्त अनुचित है।
इन्द्र: हे नल! तुम चन्द्रमा के समान अपने निर्मल यश को क्यों छोड़ रहे हो? याचना पूरा करने के लिए आग्रह स्वीकार करके फिर उसे पूरा न करना तुम्हारे जैसे व्यक्ति के लिए कलंक है। तुम्हें हम लोगों के प्रति ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए। तुमने अब तक किसी भी याचना करने वाले को ’नहीं’ नहीं कहा। अतः अब भी हम लोगों को ’नहीं’ मत कहो। याचना करने पर धीर दाता कहाँ विलम्ब करता है राजन! किसी व्यक्ति के क्षण मात्र भी जीने की ज़िम्मेदारी कोई नहीं उठा सकता। हम जैसे सतपालों को पहले देने को कह कर फिर निराश करने पर तुम्हें बड़ा कलंक तथा दोष लगेगा। अपनी कुल-मर्यादा क्यों छोड़ रहे हो, राजन!
नल: (कुछ सोचते हुए) देव! आपलोग हमें वचन में बाँधकर निज कार्य सिद्धि के लिए विवश कर रहे हैं। मैं कृतप्रतिज्ञ हूँ। अतः जो आपकी अभिलाषा है, उसे अवश्य पूरा करूँगा। परंतु यह तो बताईये कि राजमहल में निरंतर कड़ा पहरा रहता है, मैं कैसे जा सकूँगा?
इन्द्र: तुम्हें अभी भी हिचकिचाहट है राजन! देव दाता हैं। दूसरे लोग हमसे अभीष्ठ वर की याचना करते हैं। ऐसे हम तुमसे याचना कर रहे हैं, यह आश्चर्य है। हे दानवीर! तुम केवल हम लोगों के मनोरथ ही पूर्ण मत करो, इन्द्रादि दिगपाल तुम्हारे यहाँ याचक बने, ऐसे अपने यश से सारी दिशाओं को पूर्ण कर दो। तुम्हारी कीर्ति चमक उठेगी। अतः तुम्हें ऐसा अवसर नहीं चूकना चाहिए। लाभ हानि सोच लो। रही बात, तुम्हारे अन्तःपुर में प्रवेश करने की। हम आशीर्वाद देते हैं कि तुम राजमहल में बेरोक-टोक अदृश्य रुप में प्रवेश कर जाओगे और राजबाला दमयंती से अबाध रूप से मिल पाओगे। हम लोग राजद्वार के बाहर उत्सुकतापूर्वक तुम्हारी प्रतीक्षा करेंगे। शुभं भवतु।
नल: हे सुरवरों! हमारा प्रणाम स्वीकार करें। नल आपके मनोरथ की पूर्ति के लिए राजा भीम के अन्तःपुर में प्रविष्ट होने जा रहा है। (नल प्रवृत्त होता है। देवताओं का प्रस्थान।)
नल: (आँखों में आँसू भरकर आकाश में निहारते हुए) नल के जीने को धिक्कार है। हाथ में आयी हुई पारसमणि को ठोकर मारने पर विवश हो रहा है। हे देव दुर्लभ सुन्दरी राजकन्ये! ज्वाला को स्तंभित करने के लिए कूद पड़ते हैं काले-काले पतंगे,किन्तु वे जल्द ही पंखहीन बनकर राख हो जाते हैं। तब भी ज्वाला अक्षुण्ण ही रहती है। चाहे जो हो, हे आनन्द निकेतन! तुम्हारे यश की दीपशिखा अम्लान जलती रहे। मनुष्य तो सदा से ही परिस्थितियों का दास रहा है नल! चलो, अब अपनी राह पकड़ो!
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