Monday, November 27, 2023

प्राचीन भजन भाग 1

प्राचीन भजन भाग 1

भजन-संग्रह

( १ )

सब मिलके श्राज जय कहो, श्री वीर प्रभु को । 
मस्तक झुका के जय कहो, श्री वीर प्रभु की ॥टेक।।

विघ्नों का नाश होता है, लेने से नाम के । 
माला सदा जपते रहो, श्री वीर प्रभु की ॥१॥

ज्ञानी बनो दानी बनो, बलवान मी बनो ।
अकलंक सम बन जय कहो, श्री वीर प्रभु की ॥२॥ 

होकर स्वतंत्र धर्म की, रक्षा सवा करो । 
निर्भय बनो अरु जय कहो, श्री वीर प्रभु की ॥३॥

तुमको मी अगर मोक्ष को, इच्छा हुई है 'दास' । 
उस वाणी पर श्रद्धा करो, श्री वीर प्रभु की ॥४।॥

(२)

जिन वाणी मुक्ति नसैनी है, जिन वाणी ।। टेक ॥ 
यह भववधि से पार उतारन, पर भव को सुख वानी है ॥१।।
मिथ्यातिन के मनहि न श्रावै, भविजन के मन मानी है ॥२ 
धर्म कुधर्म की समझ परें सब, जुदिय जुविय कर मानी है ॥३ 'वाजूराय' मजो जिन वाणी, सुख कर्ता दुख हानी है ॥४

( ३ ) 
निरखत निज-चन्द्र-ववन, स्व-पर सुरुचि आाई ।। टेक ।। 
प्रगटी निज श्रान की, पिछान ज्ञान-मान की । 
कला उद्योत होत काम, यामिनी पलाई ॥१॥ 
सास्वत श्रानन्द स्वाद, पायो विनस्यो विषाद । 
आान में अनिष्ट इष्ट, कल्पना नसाई ॥२॥ 
साधी निज साध को, समाधि मोह व्याधि को । 
उपाधि को विराधिके, अराधना सुहाई ॥३॥ 
धन दिन छिन आाज सुगुनि, चिते जिनराज अबै । 
सुधरे सब काज 'दौल', अचल सिद्धि पाई ॥४॥ 

( ४ )

जब ते श्रानन्द जननि दृष्टि परो माई । 
तब ते संशय विमोह भरमता विलाई ।॥ टेक ॥ 
मैं हूँ चित चिह्न, मिन्न परतें, पर जड स्वरूप । 
वोउन की एकता सु, जानी दुखदाई ॥१॥ 
रागादिक बंधहेत, बंधन बहु विपत देत । 
संबर हित जान तासु, हेतु ज्ञान ताई ॥२॥ 
सब सुख मय शिव है तसु, कारन विधि भारन इमि । 
तत्व की विचारन जिन-वानि सुधि कराई ॥३॥ 
विषय चाह ज्वाल ते, वह्यो अनन्त कालते । 
सुधांशु स्यात्पदांक गाह-तै, प्रशांति भाई ॥४॥
या बिन जग जालमें न, शरन तीन कालमें । 
संभाल चित मजो सदीव, 'बोल' यह सुहाई ॥ ५ ॥

( ५ )

जोव तू अनादि हो ते भूल्यौ शिव गैलवा ॥ टेक ॥ 
मोहमव बार पियो, स्वपद विसार दियौ । 
पर अपनाय लियौ, इन्द्री सुखमें रचियो । 
भवते न भियौ न तजियौ मन मैलवा ॥ १ ॥ 
मिथ्या ज्ञान श्राचरन, घरिकर कुमरन ।

तीन लोक को धरन, तामें कियो मैं फिरन । 
पायौ न शरन लहायौ सुख शैलका ॥ २ ॥ 
अब नर भव पायो, सुथल सुकुल आयौ । 
जिन उपदेश मायो, 'दोल' झट छिटकायो । 
पर परनति दुखदायिनी चुरैलवा ॥ ३ ॥ ( ६ )

श्रापा नहि जाना तूने, कैसा ज्ञानधारी रे ॥ टेक ॥ 
बेहाश्रित करि किया श्रापको, मानत शिवमगचारी रे ॥१ 
निज-निवेद विन घोर परीषह, विफल कहो जिन सारी रे ॥२ शिव चाहे तो द्विविधिकर्म है, कर निजपरनति न्यारी रे ॥३ 'दौलत' जिन निजमाव पिछान्यौ, तिन मवविपत बिदारीरे ॥४

(७)

आतम रूप अनूपम अद्भुत, याहि लखै भर्वासषु तरो ॥टेक ।।
अल्पकाल में मरत चक्रघर, निज आतम को ध्याय खरो । केवल ज्ञान पाय मवि बोधे, ततछिन पायो लोक शिरो ॥१ या बिन समुझे द्रव्य लिग मुनि, उम्र तपन कर मार मरो । नवग्रीवक पर्यन्त जाय चिर, फेर मवार्णव माहि परो ॥२ सम्यग्दर्शन ज्ञान चरन तप, येहि जगत में सार नरो । पूरव शिव को गये जाहि अब, फिर जैहैं यह नियत करो ॥३ कोटि ग्रन्थ को सार यही है, येही जिनवानी उचरो । 'वौल' ध्याय अपने श्रतम को, मुक्तरमा तब वेग वरो ॥४ () 

(८)

आप भ्रम विनाश आप आप जान पायौ। कर्णघृत सुवर्ण जिमि चितार चैन थायौ ।॥ टेक ॥ 

मेरो तन तनमय तन मेरो मैं तन को त्रिकाल । 
कुबोध नश सुबोध मान जायो ।॥ १ ॥

यह सुजैन वैन ऐन, चिन्तन पुनि पुनि सुनैन । 
प्रगटो अब मेव निज, निवेद गुन बढ़ायो ।॥ २॥

यों हो चित श्रचित मिश्र, ज्ञेय ना अहेय हेय । 
ईंधन घनंज जैसे, स्वामि योग गायो ।॥ ३ ॥ 

भंवर पोत छुटत झटति, बांछित तट निकट जिमि । 
मोहराग रुख हर जिय, शिवतट निकटायौ ।॥ ४ ॥ 

विमल सौख्यमय सदीव, मैं हूँ मैं नहि अजीव ।
जोत होत रज्जुमय, भुजंग भय मगायो ॥ ५ ॥

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