Monday, October 27, 2025

मृत्यु के देवता

मृत्यु के देवता

रूसी उपन्यासकार लियो टॉलस्टॉय द्वारा लिखित एक बहुत ही अच्छी कहानी है.
कहानी है कि.... एक बार मृत्यु के देवता ने पृथ्वी पर अपने एक दूत को भेजा क्योंकि यहाँ एक स्त्री मर गयी थी और उसकी आत्मा को लाना था. 

आदेश पाकर देवदूत धरती पर आया लेकिन वो बहुत चिंता में पड़ गया.

क्योंकि, उसने देखा कि तीन छोटी-छोटी जुड़वां लड़कियां अभी भी उस मृत स्त्री से लगी है.

जिसमें से एक चीख रही है, पुकार रही है..
जबकि, दूसरी रोते-रोते सो गयी है जिसके आंसू उसकी आंखों के पास सूख गए हैं..
और, तीसरी लड़की उस मृतक स्त्री की छाती से दूध पीने का प्रयास कर रही है..!

तीन छोटी जुड़वां बच्चियां और स्त्री मर गयी है...जिसे कोई देखने वाला नहीं है. 
पति पहले मर चुका है.
परिवार में और कोई भी नहीं है. 
ऐसे में इन तीन छोटी बच्चियों का क्या होगा ???

उस देवदूत को ऐसी दशा देखकर बहुत दया आ गई और वो ऐसे ही ख्यालों के साथ खाली हाथ वापस लौट गया.

उसने जा कर अपने देवता को कहा कि मैं न ला सका.. इसीलिए, मुझे क्षमा करें.
लेकिन, आपको स्थिति का पता ही नहीं है.
उसकी तीन जुड़वां बच्चियां हैं– छोटी-छोटी, दूध पीती.
एक अभी भी मृतक से लगी है, दूसरी रोते-रोते सो गयी है और तीसरी अभी चीख-पुकार रही है.

ऐसी करुण दशा देखकर मेरा हृदय उसे ला न सका.
क्या यह नहीं हो सकता कि इस स्त्री को कुछ दिन और जीवन के दे दिए जाएं ? 
कम से कम लड़कियां थोड़ी बड़ी हो जाएं... 
क्योंकि, अभी उन्हें कोई देखने वाला नहीं है.

मृत्यु के देवता ने कहा...  तो तू फिर समझदार हो गया ?
उससे ज्यादा..... जिसकी मर्जी से मौत होती है .......?
जिसकी मर्जी से जीवन होता है ?

ऐसा करके तूने पाप कर दिया और तुम्हें इसकी सजा मिलेगी.
तथा, तुम्हारी सजा यह है कि अब तुझे पृथ्वी पर चले जाना पड़ेगा.
और, जब तक तू अपनी मूर्खता पर तीन बार न हंस लेगा तबतक वापस न आ सकेगा.

इसे फिर से समझना..
तीन बार न हंस लेगा अपनी मूर्खता पर...
क्योंकि, दूसरों की मूर्खता पर तो अहंकार हंसता है.
जब तुम अपनी मूर्खता पर हंसते हो तब अहंकार और खुद को समझदार समझने का भ्रम टूटता है.

देवदूत को लगा...  नहीं, मैं तो सही हूँ.
इसीलिए, वह दंड भोगने के लिए राजी हो गया. 
क्योंकि, वो जानता था कि मुझे खुद पर हंसने का मौका भला कैसे आएगा ???

खैर, इसके बाद उसे रूस की जमीन पर फेंक दिया गया.

चूँकि, उस समय सर्दियों के दिन करीब आ रहे थे इसीलिए एक चर्मकार कुछ पैसे इकट्ठे करके अपने बच्चों के लिए कोट और कंबल खरीदने शहर जा रहा था. 
जब वह शहर जा रहा था तो उसने राह के किनारे एक नंगे आदमी को सड़क किनारे पड़े हुए, ठंड से ठिठुरते हुए देखा.

वह नंगा आदमी वही देवदूत था जो दंड भोगने के लिए पृथ्वी पर फेंक दिया गया था.

उसे इस तरह ठंड से ठिठुरते देखकर उस चर्मकार को दया आ गयी और बजाय अपने बच्चों के लिए कपड़े खरीदने के...
उसने इस आदमी के लिए कंबल और कपड़े खरीद लिए.

चूँकि, वो देवदूत दंड स्वरूप धरती पर फेंका गया था इसीलिए उस आदमी के पास खाने-पीने के लिए कुछ भी नहीं था और रहने के लिए घर भी न था..
एक छप्पर तक न था जहां वो रुक सके.

इस पर उस चर्मकार ने कहा कि अब तुम मेरे साथ ही आ जाओ.
लेकिन, अगर मेरी पत्नी नाराज हो–जो कि वह निश्चित होगी..
क्योंकि, बच्चों के लिए कपड़े खरीदने लाया था, वह पैसे तो खर्च हो गए...
इसीलिए, अगर वह नाराज हो और चिल्लाए तो तुम परेशान मत होना.

क्योंकि, थोड़े दिन में सब ठीक हो जाएगा।

इसके बाद उस देवदूत को ले कर चर्मकार घर लौटा.
न तो चर्मकार को पता था कि देवदूत घर में आ रहा है और न उसकी पत्नी को.

इसीलिए, जैसे ही देवदूत को ले कर चर्मकार घर पहुंचा तो उसकी पत्नी गुस्से से एकदम पागल हो गयी.

बहुत नाराज हुई और बहुत चीखी- चिल्लायी.

ये देखकर देवदूत पहली दफा हंसा.

उसे हंसते देखकर चर्मकार ने उससे पूछा... क्यों हंस रहे हो, बात क्या है ? 

इस पर उसने जबाब देते हुए कहा...
 मैं जब तीन बार हंस लूँगा तब बता दूंगा.

देवदूत पहली बार हँसा क्योंकि उसने देखा कि इस पत्नी को पता ही नहीं है कि अनजाने में चर्मकार ने देवदूत को घर में ले आया है जिसके आते ही घर में हजारों खुशियां आ जाएंगी.

लेकिन, आखिर इंसान देख ही कितनी दूर तक सकता है ?
पत्नी तो इतना ही देख पा रही है कि एक कंबल और बच्चों के कपड़े के लिए पैसे नहीं बचे.
जो खो गया है वह सिर्फ वही देख पा रही है.. 
जो मिला है.. उसका उसे अंदाजा ही नहीं है.
मुफ्त में घर में देवदूत आ गया है. जिसके आते ही हजारों खुशियों पीछे पीछे आने वाली है.

खैर, जल्दी ही देवदूत ने महज सात दिन में चर्मकार का सब काम सीख लिया.
और, उसके जूते इतने प्रसिद्ध हो गए कि चर्मकार महज दो-तीन महीने में ही धनी होने लगा.
6 महीना होते-होते तो उसकी ख्याति सारे देश में पहुंच गयी कि उस जैसा जूते बनाने वाला कोई भी नहीं. क्योंकि, वह जूते देवदूत बनाता था.

सम्राटों के जूते वहां बनने लगे और बेहिसाब धन बरसने लगा.

एक दिन सम्राट का आदमी आया.

और, उसने कहा कि यह चमड़ा बहुत कीमती है जो आसानी से नहीं मिलता है इसीलिए कोई भूल-चूक नहीं करना.
जूते ठीक इस तरह के बनने हैं.

और, ध्यान रखना जूते बनाने हैं... स्लीपर नहीं.

क्योंकि, रूस में जब कोई आदमी मर जाता है तब उसको स्लीपर पहना कर मरघट तक ले जाते हैं.

चर्मकार ने भी देवदूत को कह दिया इस चमड़े से जूते बना देना.. स्लीपर नहीं.... 

जूते बनाने हैं... स्पष्ट आज्ञा है और चमड़ा इतना ही है.

अगर गड़बड़ हो गयी तो हम बड़ी मुसीबत में फंस जाएंगे.

लेकिन, फिर भी देवदूत ने स्लीपर ही बना दिया.

जब चर्मकार ने देखा कि स्लीपर बने हैं तो वह क्रोध से आगबबूला हो गया.
वह लकड़ी उठा कर उसको मारने को तैयार हो गया कि तू हमें फांसी लगवा देगा..
जब तुझे बार-बार कहा था कि स्लीपर बनाने ही नहीं हैं फिर तूने स्लीपर किसलिए बनाए.?

परिस्थिति देखकर.. देवदूत फिर खिलखिला कर हंसा.

क्योंकि, तभी एक आदमी सम्राट के घर से भागा हुआ आया और उसने कहा...
उस चमड़े से जूते नहीं बल्कि स्लीपर बनाना... 
क्योंकि, सम्राट की मृत्यु हो गयी है.

असल में भविष्य अज्ञात है.
सिवाए उसके और किसी को ज्ञात नहीं.
और, आदमी तो अतीत के आधार पर निर्णय लेता है.
जब सम्राट जिंदा था तो उसे जूते चाहिए थे और अब मर गया तो स्लीपर पर चाहिए.

ये देखकर वह चर्मकार उसके पैर पकड़ कर माफी मांगने लगा कि मुझे माफ कर दो मैंने तुझे मारा.
पर उसने कहा... कोई बात नहीं.
मैं अपना दंड भोग रहा हूँ.

लेकिन, आज वो दुबारा हँसा था इसीलिए चर्मकार ने फिर उससे हँसी का कारण पूछा ? 

जिस पर उसने दुहराया कि जब मैं तीन बार हंस लूँ तब कारण बता दूँगा…

असल में वो दुबारा इसीलिए हँसा था क्योंकि भविष्य हमें ज्ञात नहीं है.
इसीलिए, हम आकांक्षाएं करते हैं जो कि व्यर्थ हैं.
हम अभिलाषाएँ करते हैं जो कभी पूरी न होंगी.
हम मांगते हैं जो कभी नहीं घटेगा. क्योंकि, कुछ और ही घटना तय है. हमसे बिना पूछे हमारी नियति घूम रही है.
और, हम व्यर्थ ही बीच में शोरगुल मचाते हैं. 
हमें चाहिए स्लीपर और हम जूते बनवाते हैं.
मरने का वक्त करीब आ रहा है और जिंदगी का हम आयोजन करते हैं.

इसीलिए, अब देवदूत को भी लगने लगा कि वे बच्चियां..? 
मुझे क्या पता कि भविष्य उनका क्या होने वाला है ? 
मुझे लगता है कि मैं नाहक ही बीच में आ गया.

तभी, तीसरी घटना घटी कि एक दिन तीन जवान लड़कियाँ आयी. 

उन तीनों की शादी हो रही थी.

और, उन तीनों ने जूतों के आर्डर दिए कि उनके लिए बेहतरीन जूते बनाए जाएं.

उनके साथ एक बूढ़ी महिला उनके साथ आयी थी जो बहुत धनी थी. 

देवदूत उन लड़कियों को पहचान गया कि ये तो वे ही तीन लड़कियां हैं, जिनको वह मृत माँ के पास छोड़ गया था और जिनकी वजह से वह दंड भोग रहा है.

लेकिन, अब वे सब स्वस्थ हैं और सुंदर हैं.

उसने पूछा कि क्या हुआ और यह बूढ़ी औरत कौन है ? 

इस पर उस बूढ़ी औरत ने जबाब देते हुए कहा कि ये मेरी पड़ोसन की लड़कियां हैं.

वो एक गरीब औरत थी और उसके शरीर में दूध भी न था.
उसके पास पैसे-लत्ते भी नहीं थे और तीन बच्चे जुड़वां.

वह इन्हीं को दूध पिलाते-पिलाते मर गयी.

ये देखकर मुझे दया आ गयी क्योंकि मेरे कोई बच्चे नहीं हैं इसीलिए मैंने इन तीनों बच्चियों को पाल लिया.

अगर इसकी माँ जिंदा रहती तो ये तीनों बच्चियां गरीबी, भूख और दीनता और दरिद्रता में बड़ी होतीं.

माँ मर गयी... इसीलिए, ये बच्चियां तीनों बहुत बड़े धन-वैभव में और संपदा में पलीं.

और, अब उस बूढ़ी की सारी संपदा की ये ही तीन मालिक हैं... जिनका विवाह सम्राट के परिवार में विवाह हो रहा है.

ये जानकर देवदूत तीसरी बार हँसा और चर्मकार को उसने कहा कि मेरे हँसने के ये तीन कारण हैं. 

भूल मेरी थी.
नियति बड़ी है.

और, हम उतना ही देख पाते हैं जितना हमारे देखने की क्षमता है.
लेकिन, जो नहीं देख पाते उसका विस्तार बड़ा है.
इसीलिए, हम जो देख पाते हैं उससे हम कोई अंदाज नहीं लगा सकते कि आगे क्या होने वाला है अथवा क्या होगा.
अतः, मैं अपनी मूर्खता पर तीन बार हँस लिया हूँ जिससे अब मेरा दंड पूरा हो गया और अब मैं जाता हूँ.

इसके बाद वो देवदूत चला गया.

असल में देखा जाए तो हमलोग भी उसी शुरुआती देवदूत की तरह हैं...

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